सपा के दिग्गज नेता बेनीप्रसाद वर्मा के पुत्र राकेश वर्मा का भगवा चोला धारण करना सपा-बसपा पर भारी पड़ सकता है। उनके भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने की सिर्फ औपचारिकता शेष बची है, वह भी सोमवार को पूरी हो जाने की उम्मीद है।
ऐन चुनाव के वक्त राकेश के इस पाला बदल से जिले की चुनावी तस्वीर बदली नजर आएगी। खासकर जिले में करीब आठ प्रतिशत कुर्मी मतदाताओं का झुकाव अगर भाजपा की ओर हो गया तो सपा और बसपा का चुनावी गणित गड़बड़ा सकता है।
इसे सियासत की उलटबांसी ही कहेंगे कि खांटी समाजवादी बेनीप्रसाद वर्मा ने अपनी राजनीतिक विरासत को मुकाम देने के लिए बेटे राकेश को भाजपा में शामिल कराने की तैयारी पूरी कर दी। बेनी के इस फैसले के बाद चुनावी गणित पर नजर डालें तो भाजपा को जिले की सभी सीटों के साथ ही आसपास के जिलों में कुर्मी बाहुल्य मतदाताओं वाले क्षेत्रों में लाभ मिलेगा।
जिले में लगभग आठ प्रतिशत कुर्मी मतदाता हैं, जिन पर बेनी बाबू की अच्छी पकड़ रही है। 2007 में सपा छोड़ने के बाद उनका यह वोट बैंक तितर-बितर जरूर हुआ था, किंतु कांग्रेस होते हुए सपा में लौटने पर वे अपने वोट बैंक को बचाने की कवायद में जुटे थे।
जिले की रामनगर विधानसभा सीट से राकेश को सपा से टिकट न मिलने के बाद उनके सामने बेटे को स्थापित करना सबसे बड़ी चुनौती थी। अकेली जो राह दिखाई दे रही थी वह भाजपा की छतरी तले ही खत्म होती थी और बेनी बाबू ने आखिर राकेश को इसी छतरी के नीचे खड़ा करने का फैसला किया। भाजपा भी उनके आने से मजबूती की उम्मीद बांधे है।
बेनी के मुस्लिम समर्थक असमंजस में
जिले की रामनगर, दरियाबाद, हैदरगढ़, जैदपुर, कुर्सी व बाराबंकी सदर की सीटों पर नजर डालें तो प्रत्येक सीट पर बेनी बाबू की पकड़ रही है। यहां पर उनके समर्थक कुर्मी के अलावा मुस्लिम वर्ग के वोटर भी रहे हैं। भाजपा में शामिल होने के बाद उनके मुस्लिम समर्थक असमंजस में फंस गए हैं।