बाराबंकी। आमतौर पर माता-पिता अथवा घर परिवार का बड़ा ही अभिभावक की भूमिका निभाता है। मगर अब एक पुत्र अपने अधेड़ पिता का अभिभावक बनेगा। आजीवन कारावास की सजा काट रहे 54 वर्षीय तीरथ की हुई जेल से रिहाई के बाद उसका अभिभावक कोई और नहीं बल्कि उसका युवा पुत्र दुर्गेश बनेगा। राज्यपाल ने अधेड़ तीरथ की सजा माफ करते हुए इसकी संस्तुति की है। पिता के जेल से छूटने के बाद पुत्र ही अब बतौर अभिभावक तीरथ का आचरण परखते हुए संरक्षक का फर्ज निभाएगा। सफदगंज थाना क्षेत्र के इसरातनगर मजरे हमीद नगर गांव में एक व्यक्ति की हत्या के आरोप में गांव के तीरथ को आरोपी बनाया गया था। कोर्ट ने सुनवाई के बाद उसे दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। तीरथ वाराणसी जेल में कैदी नंबर 892 के बतौर अपनी सजा काट रहा था। सजा के दौरान उसका आचरण व व्यवहार दोनों अच्छे रहे। 29 मई तक तीरथ 19 साल 7 माह व 22 दिन की सजा पूरी कर चुका था। इस दौरान परिजनों ने तीरथ की समय पूर्व रिहाई की कोशिश करते हुए उच्चतम न्यायालय में एक रिट भी दाखिल की। इसी दौरान प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने आजीवन कारावास की सजा काट रहे तीरथ को जेल से मुक्त करने की संस्तुति कर दी।
शासन के विशेष सचिव सुरेश कुमार पांडेय ने वाराणसी के केंद्रीय कारागार के वरिष्ठ अधीक्षक को राजभवन से जारी आदेश भेजते हुए बताया कि तीरथ को यूपी प्रिजनर्स रिलीज ऑन प्रोबेशन एक्ट 1938 की धारा-दो के नियम आठ के तहत लाइसेंस द्वारा मुक्त करने की आज्ञा दी गई है। आदेश में बंदी के पुत्र दुर्गेश कुमार को उसका अभिभावक नियुक्ति किया गया है। कहा गया है कि तीरथ अपने पुत्र की देखरेख व संरक्षण में रहेगा। अभिभावक बने पुत्र की अनुमति के आधार पर ही वह कहीं आ जा सकेगा। अभिभावक बने पुत्र दुर्गेश कुमार की भी यह जिम्मेदारी होगी कि पिता तीरथ का आचरण खराब होने पर, वह इसकी सूचना तत्काल जिलाधिकारी को देगा। संवाद