बाराबंकी। आजाद हिंद फौज के जांबाज सिपाही चंद्रशेखर तिवारी की वीरगाथा अभी भी लोगों की जुबान पर चर्चा का विषय बन जाती है मगर शासन और प्रशासन की अनदेखी के चलते आजादी के इस रणबांकुरे की धरती उपेक्षा का शिकार है।
आजादी के जश्न पर गांव में उनके द्वारा लगाया गया वटवृक्ष और उनका समाधि स्थल अपना वजूद खोता जा रहा है। कल हम आजादी की 73वीं वर्षगांठ मनाने जा रहे हैं। इस पर सेनानी के 75 वर्षीय पुुत्र छन्नू तिवारी की आंखें अपने पिता की वीरगाथा बताते-बताते छलक पड़ीं। छन्नू कहते हैं कि उपलब्धि के नाम पर सिर्फ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पिता का एक कागज ही उनके पास बचा है।
सूरतगंज ब्लॉक क्षेत्र के गगौरा गांव निवासी छन्नू तिवारी (75) ने बताया कि उनके पिता चंद्रशेखर तिवारी ने सन 1938 में राजपूत रेजीमेंट जॉइन की थी। मगर करीब तीन साल बाद उन्होंने फौज की नौकरी छोड़ दी।
सन 1943 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नारा तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा से प्रभावित होकर वह शादी के कुछ दिन बाद ही परिवार को छोड़कर कोलकाता चले गए और फिर वहां से उन्होंने देश को आजादी दिलाने का सफर शुरू किया।
इसी बीच अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर महाराष्ट्र की नासिक जेल में बंद कर दिया था। तीन वर्ष की कारावास काटकर जेल से छूटे तो पंडित जवाहर लाल नेहरू खुद तांगे पर सवार होकर उन्हें लेने कारागार के गेट पर पहुंचे थे। नासिक जेल से छूटे तो सन 1946 की शुरूआत में महात्मा गांधी के आवाहन पर अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन चरम पर था।
हालांकि पंडित नेहरू द्वारा कांग्रेस जॉइन करने की बात कहने पर चंद्रशेखर तिवारी ने मना कर दिया था। चंद्रशेखर तिवारी ने इस आंदोलन में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। देश को आजादी मिलने के बाद स्वतंत्रता संग्राम सेनानी चंद्रशेखर तिवारी ने अपने गांव गगौरा में जश्न मनाते हुए एक वट वृक्ष रोपा था। ये वृक्ष आज भी छाया दे रहा है।
देश की आजादी में अहम भूमिका निभाने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी चंद्रशेखर तिवारी का परिवार आजादी के सात दशक बाद भी उपेक्षा का शिकार है। परिवारीजनों ने बताया कि मात्र स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के प्रमाणपत्र के अलावा उनके पास अब कुछ भी नहीं है। सन 1997 में चंद्रशेखर तिवारी के निधन के बाद परिवारीजनों ने जो समाधि बनवाई थी। वह भी अब जर्जर हो गई है। समाधि स्थल तक पहुंचने के लिए चकमार्ग तक नहीं है।