बाराबंकी। जिले में मनरेगा योजना के तहत मजदूरों को 100 दिन का काम नहीं मिल पा रहा है। पंजीकृत जाॅब कार्डधारकों की बड़ी संख्या के बावजूद बहुत कम लोगों को ही पूरा काम मिल सका है। ग्रामीण क्षेत्रों में मजदूरों की कमी भी एक बड़ी समस्या बन गई है। जिले में कुल 2.18 लाख जाॅब कार्डधारक पंजीकृत हैं, लेकिन 2025-26 में इनमें से केवल 4893 मजदूरों को ही मनरेगा के तहत 100 दिन का रोजगार मिला।
यह संख्या कुल पंजीकृत कार्डधारकों का एक बहुत छोटा हिस्सा है। मनरेगा योजना का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध कराना है। परंतु जिले में यह लक्ष्य पूरा होता नहीं दिख रहा है। मजदूरों को काम न मिलने से उनकी आर्थिक स्थिति प्रभावित हो रही है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी इसका नकारात्मक असर पड़ रहा है।
गांव में काम न मिलने की वजह से ज्यादातर श्रमिक शहरों की ओर पलायन करने लगे हैं। क्योंकि इन्हें यहां पर काम आसानी से मिल जाता है। यह प्रवृत्ति मनरेगा जैसी ग्रामीण रोजगार योजनाओं के लिए चुनौती बन गई है।
मजदूरों की कमी
ग्रामीण क्षेत्रों में मनरेगा के काम के लिए मजदूरों की कमी देखी जा रही है। स्थानीय स्तर पर काम करने वाले मजदूर उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं। इसका एक मुख्य कारण शहरों की ओर उनका बढ़ता रुझान है। मजदूर शहरों में आसानी से काम मिलने के कारण पलायन कर रहे हैं। इससे मनरेगा के तहत होने वाले कार्यों में बाधा आ रही है। इसके अलावा कई फैक्टरियों के संचालित हो जाने की वजह से ज्यादातर लोग यहां पर कार्य करने लगे हैं।
शहरी क्षेत्रों में रोजगार
मजदूरों का मानना है कि शहरी क्षेत्रों में उन्हें अधिक और नियमित काम मिल जाता है। मनरेगा में 252 रुपये मजदूरी मिलती है जबकि बाजार में 450 से 500 रुपये आसानी से मिल जाते हैं। शहरों में निर्माण कार्य और अन्य छोटे-मोटे काम आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं। इस कारण ग्रामीण मजदूर अपने गांवों को छोड़कर शहरों की ओर जा रहे हैं।
मनरेगा योजना के तहत जॉब कार्डधारकों को मांग के अनुसार कार्य दिया जाता है। अब तक करीब पांच हजार श्रमिकों को सौ दिन का काम मुहैया कराया गया है। गांव में श्रमिकों को ज्यादा से ज्यादा कार्य मिले इसका पूरा प्रयास किया जाता है।
- विकास मिश्रा, डीसी मनरेगा