बाराबंकी। समाज वादियों का गढ़ रहा जिला अब पार्टी में गुटबाजी के लिए जाना जा रहा है। त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में जो परिणाम आए हैं, उससे पार्टी के खोते जनाधार के पीछे गुटबाजी ही प्रमुख कारण मानी जा रही है। जिला पंचायत में जीते सदस्यों को भी न बचा पाने वाले नेताओं ने ब्लॉक प्रमुख के चुनाव में भी कोई सीख नही ली।
इसी के चलते 14 सीटें हासिल करने वाली सपा को महज चार सीटों पर ही संतोष करना पड़ा। अगर पार्टी नेतृत्व जिले में बढ़ रही गुटबाजी पर समय रहते अंकुश नही लगा पाया तो वर्ष 2022 में अपने गढ़ को वापस लाना पार्टी के लिए आसान नही होगा।
जिले में चुनाव हो या फिर नेताओं के कद की बात करें तो अवध में सपा का एक गढ़ बाराबंकी माना जाता रहा है। स्व.बेनी प्रसाद वर्मा से लेकर अरविंद कुमार सिंह गोप की पकड़ पूरे जिले में थी। एक समय था जब जिले में तीन-तीन मंत्री हुआ करते थे। बेनी बाबू के इशारे पर ब्लॉक प्रमुख, जिला पंचायत तो क्या एमएलसी के चुुनाव में भी कोई दल मैदान में उतरने का साहस नही जुटा पाता था।
वर्ष 2012 विधानसभा चुनावों में जिले की सभी सीटें सपा की झोली में थीं, पर 2017 में सिर्फ एक विधायक चुनाव जीत सका था। पार्टी बंटवारे से लेकर चुनाव तक आपस की गुटबाजी चरम पर थी। यह पहला चुनाव है जो कि बेनी बाबू के न रहने पर लड़ा गया। जिसमें भाजपा का जिला पंचायत अध्यक्ष बना और 12 सदस्य जीतने वाली पार्टी को मात्र आठ वोट मिले।
चार बार सांसद व तीन बार विधायक रहे रामसागर रावत ने कहा कि यह हम लड़ते तो चुनाव जीत जाते। उन्होंने इसके लिए पार्टी नेताओं को दोषी करार दिया। यह कोई पहली बार नहीं यह पहले भी कई नेताओं पर खुलेआम आरोप लगा चुके हैं। लोकसभा चुनाव में हार के बाद भी हार को भी गुटबाजी ही करार दिया था। (संवाद)
अखिलेश को भी है बाराबंकी की अहमियत का अहसास
विधानसभा 2022 में होने वाले आम चुनाव का सेमीफाइनल कहा जाने वाला पंचायत चुनाव से पहले बेनी बाबू की मूर्ति अनावरण में आए पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अपने बयान में साफ संकेत भी दिया था कि हम जब-जब बाराबंकी जीते हैं, तब-तब हमारी प्रदेश में सरकार बनी है।
सभी लोग बेनीबाबू और नेताजी के नाम पर एक होकर चुनाव लड़ें तो सरकार बनने से कोई रोक नही पाएगा। लेकिन पंचायत चुनाव में इसका ठीक विपरीत असर देखने को मिला। डीडीसी की अधिकांश सीटों पर बागी मैदान में उतरे और नतीजा यह रहा कि 57 सीटों में से 12 पर ही संतोष करना पड़ा।
जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में चार तो पार्टी प्रत्याशी के खिलाफ चले गए। इससे भी सीख न लेकर पार्टी ब्लॉक प्रमुख चुनाव में भी नहीं सुधरी। पहले प्रत्याशियों का नाम घोषित किया, फिर विरोध के कारण सूची रोक दी और फिर घोषित तो हुई पर दस सीटों पर ही प्रत्याशी उतरे। ऐसे में उसे चार सीटें ही जो मिली हैं, उनमें पार्टी नेताओं से ज्यादा पारिवारिक बैंकग्राउंड मजबूत होने के कारण ही वे जीत सके।
चुनाव में देखने को मिला है कि कुर्सी पाने के लिए कई नेताओं के परिवारों में तोड़फोड़ की नौबत आई, पर बड़े नेताओं के हस्तक्षेप के बाद मामला टल गया। अभी भी पार्टी के दिग्गज नेता से लेकर उनके सिपहसालार तक के बीच गुटबाजी थमने का नाम नहीं ले रही। यही नही विपक्षी दलों से ज्यादा दल के नेताओं का कद कैसे घटाया जाए, इस पर ज्यादा जोर आजमाइश चल रही है। ऐसे माहौल में में 2022 का चुनाव पार्टी के लिए बहुत आसान नही होगा।