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...ज्ञान केे जो धाम थे वह भी सियासी हो गए

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बाराबंकी। कवि सम्मेलन में काव्य पाठ करतीं कवियत्री मालविका हरिओम। - फोटो : BARABANKI
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बाराबंकी। महादेवा महोत्सव की तीसरी रात हिंदी साहित्य के नाम रही। देश के ख्यातिलब्ध कवियों ने ऐसी महफिल सजाई कि भीड़ टस से मस नहीं हुई। वाद यंत्र, संगीत, नृत्य कुछ भी नहीं बस मुक्त कंठ से लयबद्ध निकलने वाला शब्दों का प्रवाह हर किसी को पूरी रात एक जगह बैठने पर मजबूर कर दिया।
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सबसे पहले विधायक शरद अवस्थी व एसडीएम आनंद वर्धन ने दीप प्रज्ज्वलित कर काव्यपाठ का शुभारंभ किया। इसके बाद कवित्री मालविका हरिओम ने काव्य पाठ किया कि हमें तो ज्ञान का उपहार दे मां, सुरों में सत्य की झनकार दे मां। संचालन का जिम्मा कवि राम किशोर तिवारी ने संभाला। इसके बाद प्रख्यात मिश्रा ने पढ़ा मैं या तो तिरंगा में लिपट कर आऊंगा मां, यह तो तिरंगा सीमा पर लहरा लूंगा मां सुनाया तो खूब तालियां बजी।
इसके बाद सरला शर्मा ने सुनाया बिक रहे नेताओं के वादे वासी हो गए, ज्ञान के जो धाम थे वह भी सियासी हो गए। कवि बिहारी लाल अंबर ने अपनी कविताओं से खूब हंसाया। उनकी यह कविता वतन तेरा गौरव घटाने से पहले यह सर काट दूंगा झुकानें से पहले, अगर दर्द तेरा लिख नहीं सका कलम तोड़ देगे चलाने से पहले। वाहिद अली वाहिद चमक इसमें नहीं सारी गलज है अभी पूरी नहीं आधी गजल है। यह दौलत की नुमाइश चाहती है। यह रेशम से बुनी खादी गजल है।
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फारुख सरल ने अनोखा समा बांधा उनकी यह कविता बूंद बूंद से गहरा सागर बनता है, ऊंचा पर्वत कड़कड़ मिलकर बनता है काफी सराही गई। पदम अलबेला ने कवित पढ़ी सज धज के गोरी चली लेकर हरि का नाम, आशा की थी राम की मिल गया आसाराम पर खूब तालियां बजी। देर रात तक श्रोता कवि सम्मेलन का आनंद लेते रहे। इसके अलावा शंभू शिखर, मनवीर मधुर, सविता श्रीवास्तव आदि कवियों ने भी अपनी रचनाएं प्रस्तुत की। इस मौके पर बीडीओ कमलेश कुमार, विजय यादव, जितेंद्र कटियार, रामदेव निषाद, सीओ शैलेंद्र राय, बद्रीविशाल आदि मौजूद रहे।
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