बाराबंकी। सिरौलीगौसपुर तहसील क्षेत्र में सरकारी डिग्री कॉलेज का न होना छात्र-छात्राओं के भविष्य के लिए अभिशाप बन गया है। आलम यह है कि इंटरमीडिएट की परीक्षा ससम्मान उत्तीर्ण करने के बाद भी आर्थिक रूप से कमजोर और ग्रामीण क्षेत्रों के होनहार छात्र उच्च शिक्षा की मुख्यधारा से कट रहे हैं। तराई क्षेत्र के इस इलाके में कृषि पर निर्भर परिवारों के पास निजी कॉलेजों की भारी-भरकम फीस भरने का सामर्थ्य नहीं है।
क्षेत्रीय युवाओं का कहना है कि इंटर के बाद पढ़ाई जारी रखने के लिए केवल निजी कॉलेजों का विकल्प बचता है, जिनकी फीस सरकारी संस्थानों की तुलना में दो से ढाई गुना अधिक है। डूडी गांव के नितेश कुमार जैसे कई युवा बताते हैं कि सरकारी कॉलेज न होने के कारण वे उच्च शिक्षा के बजाय खेती करने को मजबूर हैं। वहीं, छात्राओं के लिए समस्या और भी गंभीर है। करोरा गांव की अनुपम चौहान के अनुसार, आवागमन के साधनों का अभाव और नजदीकी सरकारी डिग्री कॉलेज की अत्यधिक दूरी लड़कियों के लिए उच्च शिक्षा की राह में रोड़ा बनी हुई है।
हैरानी की बात यह है कि क्षेत्र में एक आईटीआई कॉलेज स्वीकृत तो है, लेकिन इसका लाभ स्थानीय छात्रों को नहीं मिल रहा। इसका संचालन सिरौलीगौसपुर से लगभग 45 किलोमीटर दूर जहांगीराबाद के महुआ मऊ में किया जा रहा है। इतनी लंबी दूरी तय करना और परिवहन का खर्च उठाना एक साधारण किसान परिवार के बच्चे के लिए कठिन है।