चुनाव लोकतांत्रिक शासन का आधार है। स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव व्यवस्था लोकतंत्र को स्थायित्व करती है। लेकिन चुनाव के समय कुछ लोग भ्रष्ट तरीकों को अपनाकर चुनावी प्रक्रिया में व्यवधान डालने की कोशिश करते हैं। चुनाव आते ही राजनीतिक पार्टियों द्वारा मतदाताओं को लुभाने की कोशिशें तेज हो जाती हैं। कोई पैसे व शराब बांटकर तो कोई उपहार बांटकर वोटरों को लुभाता है। करोड़ों रुपये पकड़े जाते हैं। हजारों बोतल शराब पकड़ी जाती हैं।
बीते दिनों जिले में जिस तरीके से करोड़ों रुपये की नकदी पकड़ी गई और आधा दर्जन वाहन सीज किए गए। इसके अलावा कई वाहनों को शराब की बोतलों व प्रचार सामग्री केसाथ पकड़ा गया। उससे यही प्रतीत होता है कि चुनाव आयोग की तमाम सख्ती के बावजूद अराजकतत्व अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे हैं। जाहिर है, जिन पैसों से यह सब होता है, वह पैसा सही तो नहीं ही होगा।
नोटबंदी के बाद तो समझा यह जा रहा है कि अब बारी कैशलेश चुनाव की है। लेकिन आधुनिकीकरण के लंबे-चौड़े प्रचार से भी ग्रामीण मतदाता आधुनिक नहीं हो पा रहा है और उसे कैशलेस की परिभाषा ही समझ नहीं आ रही है। पैसे के बल पर प्रत्याशी भी जैसे-तैसे चुनाव जीतने की फिराक में हैं।
राजनीतिक पार्टियों को ये पैसा कहां से मिलता है, इसकी पारदर्शिता के अभाव के चलते विभिन्न प्रकार के राजनीतिक भ्रष्टाचार पनपते हैं। जब तक राजनीतिक और चुनावी गतिविधियों में होने वाला भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा, तब तक देश से भ्रष्टाचार कभी नहीं खत्म हो सकता। ऐसे में रजानीतिक दलों को चाहिए कि निष्पक्ष चुनाव कराने में अहम भूमिका निभाएं और चुनाव आयोग का साथ दें।