बाराबंकी। ग्राम पंचायतों में डिजिटल बैंकिंग के जरिये राजस्व बढ़ाने की योजना में बड़े फर्जीवाड़े का खुलासा हुआ है। पंचायत सहायकों ने सरकारी क्यूआर कोड हटाकर अपना निजी बारकोड लगा दिया और प्रमाण पत्रों की फीस सीधे अपने बैंक खातों में ट्रांसफर करा ली। लिखा-पढ़ी में कुल 13.14 लाख रुपये की आमदनी दर्ज हुई थी लेकिन जब जांच हुई तो सरकारी ओएसआर खाते में महज आठ हजार रुपये ही पाए गए।
लेनदेन न होने से खाते बंद होने पर जब मामला पकड़ में आया तो सख्ती के बाद गुपचुप खातों का संचालन कराकर 4.03 लाख रुपये जमा करा दिए गए। इस खेल में अब तक 10.63 लाख रुपये का घालमेल उजागर हुआ है। यह खेल ग्राम प्रधानों और पंचायत सचिवों की साठगांठ से चलने की आशंका है क्योंकि खाता दोनों के संयुक्त हस्ताक्षर से चलता है। खाते में जमा होने वाली 30 रुपये फीस में से 10 रुपये पंचायत खाते में जाने थे और पांच रुपये सहायक को इंसेंटिव मिलना था।
ब्लॉकवार दबाई गई रकम का ब्योरा
सरकारी आंकड़ो के अनुसार सबसे ज्यादा सिद्धौर ब्लॉक में 1.69 लाख और देवा में 1.44 लाख रुपये की निजी बार कोड से स्कैन कर दबा ली गई। इसके अलावा बनीकोडर में 1.33 लाख, बंकी में 1.07 लाख, दरियाबाद में 92 हजार, त्रिवेदीगंज में 79 हजार, निंदूरा में 73 हजार, हरख में 72 हजार, हैदरगढ़ में 69 हजार, सूरतगंज में 53 हजार, सिरौलीगौसपुर में 35 हजार और फतेहपुर में 31 हजार रुपये सरकारी खाते में जमा नहीं हुए। पूरेडलई, मसौली व रामनगर में पुराना समायोजन होने से बैलेंस शून्य दर्ज है। 13.14 लाख रुपये का यह केवल वह आंकड़ा है जो लिखा-पढ़ी में दर्ज है। बिना रिकॉर्ड हुए कैश लेन-देन का इसमें कोई जिक्र नहीं है। इससे पूरे खेल में लाखों के घोटाले की आशंका जताई जा रही है।
डीपीआरओ भूषण कुमार ने बताया कि 2022 में शुरू ओएसआर व्यवस्था से पंचायतों की आय बढ़नी थी लेकिन 13 लाख से अधिक की कमाई खातों में जमा ही नहीं हुई। कार्यभार संभालने के समय खातों में महज आठ हजार रुपये थे। सख्ती बरतने के बाद अब 4.03 लाख रुपये जमा हो सके हैं, फीस की बाकी धनराशि को लेकर जांच जारी है। (संवाद)