बाराबंकी। मत्स्य किसानों की आय को दोगुना करने के लिए जिले में तैयार किए गए प्रदेश के पहले हैचरी प्लांट में झींगा प्रजाति की मछलियों के बीज (सीड्स) को तैयार किया जाएगा। खारे पानी में पलने और बढ़ने वाली इस विशेष प्रजाति की मछली को सहेजने के लिए मुंबई के समुद्र से पानी मंगाया जाएगा। नर और मादा झींगा मछलियों के भ्रूण से होने वाले बच्चों को पाल कर उसे मत्स्य किसानों को बीज के रुप में उपलब्ध कराया जाएगा। इस झींगा मछली को किसान चार से पांच सौ रुपये प्रति किलो की दर से बेच कर अच्छी आमदनी पैदा कर सकेंगे। इस प्लांट को संचालित करने की जिम्मेदारी मत्स्य विकास अभिकरण को मिली है।
लखनऊ सीमा से सटे सफेदाबाद क्षेत्र के संदौली उमरपुर गांव में करीब तीस लाख की लागत से हैचरी प्लांट का निर्माण कराया गया है। इस प्लांट में पलने वाले झींगा मछलियों के बच्चों के लिए अलग-अलग आधा दर्जन फाइबर टैंक बनाए जाएंगे। इनमें साइज के अनुसार सीड्स को डाला जाएगा। इसके अलावा इसमें आर्टिफिशियल सी वॉटर भी तैयार किया जाएगा। जिले के सहायक निदेशक मत्स्य विकास प्राधिकरण वीएस चौरसिया ने बताया कि यह प्रदेश का पहला हैचरी प्लांट होगा। समुद्री पानी लाकर इस प्लांट के टैंकों में भरकर नारा व मादा झींगा के ब्रूडर से 45 दिनों में सीड्स को तैयार किया जाएगा। इसके बाद झींगा के बच्चों को मत्स्य किसानों को बेचा जाएगा।
प्रदेश के एकलौते हैचरी प्लांट मार्च 2020 तक पूरी तरह से तैयार हो जाएगा। भवन निर्माण का काम पूरा होने के बाद अब इसमें कुछ उपकरण लगाने की तैयारी की जा रही है। इसके बाद समु्द्र के खारे पानी को डालकर नार व मादा झींगा के ब्रूडर को डालकर बच्चें तैयार किए जाएंगे। झींगा सीड्स का उत्पादन जून तक शुरु हो जाएगा। जिसे मत्स्य किसान प्रति सीड्स तीन रुपये ले सकेंगे। और फिर पांच से छह में इसे तैयार कर पांच सौ रुपये प्रतिकिलो की दर से बाजार में बिक्री कर कम लागत में अच्छी आमदनी पैदा कर सकेंगे।
झींगा हैचरी प्लांट का निर्माण सात सालों से लटका हुआ था। बजट न मिलने से इसका निर्माण पूरा नहीं हुआ था। अनदेेखी के चलते यह जंगल झांड़ियों में तब्दील हो गया था लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद और मत्स्य विभाग की कागजी दौड़ भाग से मिले बजट से इसका निर्माण पूरा करा लिया गया है। इससे मत्स्य किसानों को काफी हद तक लाभ पहुंचेगा।