महाभारतकालीन पौराणिक विरासत पारिजात वृक्ष का उपचार न हो पाने के कारण उसका अस्तित्व समाप्त होने की कगार पर पहुंच रहा है। यदि समय रहते शासन स्तर से कोई ठोस कदम बीमार पारिजात वृक्ष के लिए नहीं उठाया गया तो यह देववृक्ष इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जाएगा।
जनपद मुख्यालय से करीब 42 किमी. दूर ग्राम बरौलिया में स्थित देव वृक्ष पारिजात 10 वर्षाें से अधिक समय से बीमार है। महाभारतकाल में कहा जाता है कि माता कुन्ती के द्वारा कुन्तेश्वर धाम में स्वर्ण पुष्पों से शिव की उपासना करने के लिए अर्जुन स्वर्ग के इन्द्र की वाटिका से पारिजात वृक्ष की डाल को तोड़ कर लाए थे। उसके स्वर्णमयी आभा वाले पुष्पों से माता कुन्ती ने पहले शिव की उपासना की जिससे महाभारत काल में पांडवों को विजयश्री प्राप्त हुई। यही कारण है कि इसे कल्पवृक्ष भी कहा जाता है। इसके पश्चात उसे ग्राम बरौलिया में रोपित कर दिया गया। तभी से यह अपने अस्तित्व से बनाए हुए है। गंगा दशाहरा के समय इसमें पुष्प लगते हैं। जो अपनी भीनी-भीनी सुगंध से सारे वातावरण को आच्छादित कर देते हैं। गौरतलब है कि उक्त देववृक्ष पारिजात की जड़ों में 10 वर्षों से अधिक समय से विशेष प्रजाति की किट की आवाज करता हुआ कीड़ा लगा हुआ था। जो दिन रात उसके तने का रस चूस कर लगभग ढाई फीट की गहराई तक खोखला बना चुका है। कुछ दिन पूर्व वनस्पति विभाग की एक टीम आई थी। जिसने इसका उपचार किया और कुछ कीड़ों को जाल में बंद करके परीक्षण के लिए प्रयोगशाला ले जाया गया था।
परन्तु इतना सब कुछ करने के बावजूद मात्र कैम्पस की मिट्टी बदलवायी और धुलाई के लिए वन विभाग ने फव्वारे लगा कर महीने दो महीने तक वृक्ष की धुलाई व देखभाल करने के पश्चात कर्तव्यों से इतिश्री कर लिया। बाबा रामसजीवन दास व मंगल दास बताते हैं कि उस समय वृक्ष की सेहत कुछ दुरुस्त हुई थी। देख रेख के अभाव में 4 वर्षों से अधिक समय से खराब पडे फव्वारे को नहीं सही कराया गया और न ही वनस्पति विभाग के डॉक्टर इस वृक्ष की दशा को देखने आए। इनता ही नहीं करीब दो सालों से उखड़ी पड़ी बोरिंग भी आज ज्यों का त्यों पड़ी है। यदि समय रहते शासन ने इस ऐतिहासिक विरासत की ओर ध्यान नहीं दिया तो इसका अस्तित्व समाप्त होकर इतिहास के पन्नों तक रहा जाएगा।