शहर के प्राचीन नागेश्वरनाथ मंदिर स्थित तालाब पर सोमवार शाम ढलने के बाद जगमगाते दीपों का नजारा सभी के दिलाें को भा गया। देव दीपावली के अवसर पर इस तालाब के हर हिस्से को 51 सौ दीपाें से सजाने के साथ ही मुख्य हिस्से को प्रज्जवलित दीपाें से सजाने सेे ऐसी मनमोहक छटा बिखर गई जिसे देख लोग मंत्रमुग्ध हो गए।
शहर के उत्तर स्थित नागेश्वरनाथ का यह शिवालय शैव व वैष्णव भक्तों का सममिश्रण रूप है। इसी मंदिर के सन्निकट तालाब बना हुआ है। जिसे मांगलिक व अन्य कार्यक्रमाें के लिए विशेष दर्जा मिला हुआ है। आमतौर पर शाम ढलने के बाद इस तालाब पर रविवार को खासी चहल पहल रहती है। देव दीपावली त्योहार दीपावली के 14 दिन बाद कार्तिक पूर्णिमा को धूमधाम से मनाया गया। कार्तिक पूर्णिमा पर सोमवार को देव दीपावली पर इस तालाब को 51 सौ दीयों से सजाया गया। शाम को दीपों के जलने के बाद एक अद्भुत व मंत्रमुग्ध करने वाली छटा बिखरी।
मुख्य गेट को दीपों से आकर्षक ढंग से सजाया गया। इसके बाद सभी ने पुष्प अर्पित करने के बाद आरती भी उतारी। आदर्श व्यापार मंडल के जिलाध्यक्ष राजीव गुप्ता बब्बी की ओर से प्रतिवर्ष कार्तिक पूर्णिमा के दिन नागेश्वर नाथ मंदिर में देव दीपावली पर इस तालाब को दीयाें से सजाया जाता है। बब्बी गुप्ता ने बताया कि देव दीपावली के दिन भगवान विष्णु नींद से जागते हैं।
यह भी माना जाता है कि देव दीपावली पर महालक्ष्मी अपने स्वामी भगवान विष्णु से पहले जाग जाती हैं। इसलिए दीपावली के 14 दिन के बाद देवताओं की दीपावली मनाई जाती है। देव दीपावली की पृष्ठभूमि पौराणिक कथाओं से भरी हुई है। एक कथा के अनुसार भगवान शंकर ने देवताओं की प्रार्थना पर सभी को उत्पीड़ित करने वाले राक्षस त्रिपुरासुर का वध किया जिसके उल्लास में देवताओं ने दीपावली मनाई।
जिसे आगे चलकर देव दीपावली के रूप में मान्यता मिली। इसी संदर्भ में एक अन्य कथानक भी है कि त्रिशंकु को राजर्षि विश्वामित्र ने अपने तपोबल से स्वर्ग पहुंचा दिया। देवतागण इससे उद्विग्न हो गए और त्रिशंकु को देवताओं ने स्वर्ग से भगा दिया। श्रापग्रस्त त्रिशंकु अधर में लटके रहे। त्रिशंकु को स्वर्ग से निष्कासित किए जाने से क्षुब्ध विश्वामित्र ने पृथ्वी व स्वर्ग आदि से मुक्त एक समूची सृष्टि को ही अपने तपोबल से रचना प्रारंभ कर दी।
उन्होंने कुश, मिट्टी, ऊंट, भेड़-बकरी, नारियल, कोहड़ा, सिंघाड़ा आदि की रचना का क्रम प्रारंभ कर दिया। इसी क्रम में विश्वामित्र ने ब्रह्मा, विष्णु व महेश की प्रतिमा बनाकर उन्हें अभिमंत्रित कर उनमें प्राण फूंकना आरंभ किया तभी सारी सृष्टि डांवाडोल हो उठी और हर ओर कोहराम मच गया। हाहाकार के बीच देवताओं ने राजर्षि विश्वामित्र से प्रार्थना की।
तब महर्षि विश्वामित्र प्रसन्न हो गए ओर उन्होंने नई सृष्टि की रचना का अपना संकल्प वापस ले लिया। देवताओं व ऋषि मुनियों मेें प्रसन्नता की लहर दौड़ गई। इस अवसर पर दीपावली मनाई गई। यही अवसर अब देव दीपावली के रूप में विख्यात है। नागेश्वरनाथ मंदिर तालाब परिसर में दीप जलने के बाद सभी दीपाें से एक अद्भुत व मंत्रमुग्ध कर देने वाली छटा बिखरी। इसके बाद सभी ने पुष्प अर्पित करने के साथ ही आरती भी उतारी।