बाराबंकी। अंकल आप तो जानते ही होंगे कि आपके बहादुर थानेदार रायसाहब यादव और दरोगा अखिलेश राय ने सोमवार सुबह कोठी थाने में मेरी मां को पेट्रोल डालकर जिंदा जला दिया। उनको आपके ही पुलिस वाले और कुछ लोग जिला अस्पताल ले गए, लेकिन मंगलवार सुबह मेरी मां ने लखनऊ में तड़प-तड़पकर दम तोड़ दिया।
अंकल, अब कौन मुझे गोद में प्यार करेगा, कौन मुझे तैयार कर स्कूल भेजेगा। मेरी मां कहती थी कि पुलिस हमारी सुरक्षा के लिए होती है। सड़क पर एक भी सिपाही खड़ा है तो रात में भी हम बेधड़क घर से बाहर निकल सकते हैं, लेकिन अंकल, आप जानते हैं दो दिन से सब लोग पुलिस को बहुत बुरा-भला कह रहे हैं। कहते हैं कि तुम्हारी मां को पुलिस वालों ने मार डाला। थाने में जहां सब अपनी फरियाद लेकर जाते हैं। वहीं पर उनसे हैवानियत हुई। क्यों अंकल? अगर मेरे मामा और ममेरे भाई ने कोई अपराध किया था तो मेरे पापा का क्या कसूर था। रात के दो बजे थानेदार और दरोगा सीढ़ी लगाकर मेरे आंगन में चोरों की तरह क्यों कूदे। मेरी मम्मी से बदतमीजी की और पापा को पीटते हुए थाने उठा ले गए। वहां दिन भर उन्हें प्रताड़ित किया गया। मेरी मां ने पापा को छुड़ाने के लिए सबसे गुहार लगाई। आपसे से भी फरियाद की, लेकिन शायद आप थानेदार के आगे बेबस थे या कोई और बात थी। सोमवार देर रात तक आप और आपके सहयोगी पापा को छोड़ने की बात कहते रहे लेकिन छोड़ा नहीं। मां पापा से बहुत प्यार करती थीं इसलिए सुबह खुद ही थाने पहुंच गईं... कानून पर भरोसा कर, लेकिन अंकल थाने में तो कानून कहीं था ही नहीं। थानेदार और दरोगा पापा को छोड़ने के लिए पैसा मांगने लगे, लेकिन मेरी मां ने पैसा देने से मना कर दिया। उसके बाद कानून की देहरी पर जो हैवानियत हुई आपको कुछ देर में पता चल ही गया था। अंकल आपसे बस मेरा इतना ही कहना है कि जिस तरह मेरे मामा के अपराध पर मेरे पापा को उठाया गया वैसे किसी और के रिश्तेदार को मत उठाइएगा। नहीं तो फिर कोई महिला अपने पति को छुड़ाने थाने जाएगी और वहां पर दूसरे पुलिस वाले उसे जिंदा फूंक देंगे। फिर किसी बेटी से मां की गोद छिन जाएगी। बस अंकल उन दोनों आरोपियों को जल्दी से पकड़ लीजिए।
आपकी पुत्री समान .......
प्रस्तुति - रमेश वर्मा