बाराबंकी के बाबा रामशंकर तिवारी उर्फ परमानंद खुद के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द किये जाने की गुजारिश के साथ हाईकोर्ट पहुंच गए। उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच ने बाबा के वकील द्वारा उनकी याचिका पर बल न दिए जाने की वजह से इसका निपटारा कर दिया। न्यायमूर्ति अजय लांबा और न्यायमूर्ति रवीेंद्र नाथ मिश्र-द्वितीय की खंडपीठ ने गुरुवार को यह आदेश बाबा परमानंद की याचिका पर दिया।
इसमें बाराबंकी के देवां थाने में भा.द.वि. की धारा 420 (धोखाधड़ी) समेत सूचना तकनीक कानून सन् 2008 की धारा 68 के तहत दर्ज कराई गई प्राथमिकी को रद्द किए जाने की गुजारिश की गई थी। सरकारी वकील का कहना था कि याची द्वारा कथित तौर पर किए गए अपराध में सात साल से कम सजा का प्रावधान है।
ऐसे में आरोपी की गिरफ्तारी संबंधी कानूनी प्रावधान (दंड प्रक्रिया संहिता की धारा-41-ए) का सुप्रीमकोर्ट की वर्ष 2014 की एक नजीर के तहत सख्ती से पालन किया जाएगा। सरकारी वकील के इस रुख पर याची के वकील ने याचिका को जोर न देने पर निस्तारित किए जाने की गुजारिश की। कोर्ट ने इस पर याचिका को निस्तारित कर दिया।