बाराबंकी। लोकसभा चुनाव 2024 में बाराबंकी सीट गंवाने के बाद भारतीय जनता पार्टी ने संगठन में किए गए नए फेरबदल के जरिये यह संकेत दे दिया है कि 2027 के विधानसभा चुनाव और 2029 के लोकसभा चुनाव की रणनीति का केंद्र बाराबंकी में दलित, खासकर रावत (पासी) समाज होगा। पूर्व सांसद उपेंद्र सिंह रावत को प्रदेश महामंत्री और पूर्व सांसद प्रियंका सिंह रावत को प्रदेश उपाध्यक्ष बनाए जाने को डैमेज कंट्रोल का आधार पाना जा रहा है।
भाजपा अपनी हार को सामान्य चुनावी पराजय नहीं मान रही, बल्कि दलित सामाजिक आधार में आई कमजोरी के रूप में देख रही है। ये बदलाव केवल पद वितरण नहीं, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव का ट्रेलर और 2029 के लोकसभा चुनाव की शुरुआती बिसात माने जा रहे हैं।
बाराबंकी लोकसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है और यहां करीब 24 से 26 प्रतिशत दलित मतदाता हैं। चुनावी परिणाम तय करने की स्थिति में हैं। इनमें लगभग 12 प्रतिशत पासी (रावत) मतदाता हैं, जिनका झुकाव जिस दल की ओर होता है, उसकी जीत की संभावना मजबूत हो जाती है। यही कारण है कि इस सीट पर दलित नेतृत्व हमेशा चुनावी रणनीति का केंद्र रहा है।
2014 और 2019 में लगातार दो बार भाजपा ने यह सीट जीती, लेकिन 2024 में परिस्थितियां बदल गईं। पार्टी ने पहले उपेंद्र सिंह रावत पर भरोसा जताया, लेकिन चुनाव के दौरान कथित विवादित वीडियो सामने आने के बाद अंतिम समय में टिकट बदलकर जिला पंचायत अध्यक्ष राजरानी रावत को मैदान में उतारना पड़ा।
भाजपा को उम्मीद थी कि संगठन, सरकार और प्रधानमंत्री की लोकप्रियता के सहारे सीट बच जाएगी, लेकिन कांग्रेस-समाजवादी पार्टी गठबंधन के उम्मीदवार तनुज पुनिया ने जीत दर्ज कर ली। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दलित मतदाताओं, विशेषकर रावत समाज के एक हिस्से की नाराजगी और टिकट परिवर्तन से पैदा हुई असमंजस की स्थिति ने भाजपा को नुकसान पहुंचाया। अब भाजपा ने उपेंद्र सिंह रावत और प्रियंका सिंह रावत दोनों पूर्व सांसदों को प्रदेश संगठन में बड़ी जिम्मेदारी देकर कई संदेश एक साथ देने की कोशिश की है।
दलित मतदाताओं का भरोसा जीतना चुनौती
भाजपा के सामने केवल सीट वापस जीतने की चुनौती नहीं है, बल्कि दलित मतदाताओं का भरोसा दोबारा हासिल करना भी बड़ी परीक्षा होगी। दूसरी ओर कांग्रेस के सांसद तनुज पुनिया अब क्षेत्र में अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने में जुटे हैं। वे भाजपा के लिए बड़ी चुनौती है।