सैदनपुर। माटी पर जब छेनी टकराती है और बारीक ब्रश चलता है, तब मूर्तिकार का अद्भुत हुनर सामने आता है। कला और सौंदर्य की यही जुगलबंदी माटी के गणपति को सजीव बना देती है। ऐसे कलाकार किसी नौकरी की चाह छोड़कर अपना पूरा जीवन माटी की साधना में ही समर्पित कर देते हैं। सैदनपुर गांव के निवासी मूर्तिकार वेदप्रकाश पिछले दो दशकों से इसी कला के सहारे अपने पूरे परिवार का भरण -पोषण कर रहे हैं।
बिना किसी सरकारी मदद या बड़ी पूंजी के केवल अपनी मेहनत और लगन के बल पर वह इस हुनर को जिंदा रखे हुए हैं। उन्होंने बताया कि मिट्टी ढालने से लेकर प्रतिमा तैयार करने तक में अपार धैर्य चाहिए। सबसे पहले चिकनी मिट्टी से ढांचा बनता है, फिर धूप में सुखाकर बारीक रंगों से नैन-नक्श उभारे जाते हैं। चेहरे की फिनिशिंग और आंखों की बनावट में सबसे ज्यादा एकाग्रता लगती है। आगामी 14 सितंबर को विघ्नहर्ता की स्थापना होगी। इसके तुरंत बाद वह मां दुर्गा की प्रतिमाएं गढ़ने में जुट जाएंगे। इस बार बाजारों में डेढ़ फीट से लेकर चार फीट तक की हस्तनिर्मित प्रतिमाओं की अच्छी मांग बनी हुई है। सुबह से देर रात तक की मेहनत ही परिवार को ऊर्जावान बनाए रखती है। मूर्तिकार वेद प्रकाश बताते हैं कि इस लिए उन्होंने नौकरी के बजाय माटी की सेवा को जीवन का ध्येय बनाया है। इसी हुनर के दम पर बच्चों की पढ़ाई के साथ ही घर का चूल्हा भी आराम से जलता है। (संवाद)