फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

प्रतिवर्ष उजडना और बसना बनी इनकी नियत

विज्ञापन
विज्ञापन
प्रतिवर्ष उजड़ना और बसना बनी इनकी नियत
विज्ञापन


बाराबंकी। पिछले वर्ष बाढ़ से कटे एल्गिन चरसड़ी बांध की दोबारा मरम्मत न किए जाने से घाघरा के उस पर तराई में बसे जिले के गांव में बाढ़ का पानी पहुंचने को है। बढ़ते जलस्तर को देखकर इन गांव में रहने वाले लोगों का पलायन भी शुरू हो गया है। बंधे पर लोग अपने ठिकाने बनाने लगे हैं। तो कई परिवार पहले से ही बंधे पर अपना आशियाना बनाकर रहने भी लगे है। वहीं घर की कीमती गृहस्थी अपने रिश्तेदारों के यहां पहुंचाने का जतन भी कर रहे है। इन गांव के बाशिंदों की नियत उजड़ना व बसना बन गई है। कई पीढ़िया बाढ़ की तबाही झेलती-झेलती गुजर गई। मगर, स्थाई हल नही मिला। जिला प्रशासन की ओर से सहायता के नाम की जाने वाली खानापूर्ति से अब लोग वाकिफ हो चुके हैं। ऐसे में वह इस बार पहले से ही बाढ़ से बचाव की तैयारियों में जुटे है। प्रशासनिक तैयारियों के नाम पर पिछले वर्ष जहां बांध कटा था, उसी के दोनों छोरों को बचाने के इंतजाम कर अपना बचाव करने मेे जुटा है। वहीं इसकी मरम्मत का कार्य भी बाढ़ राज्यमंत्री के निरीक्षण की भनक लगने के बाद शुरू हुआ।

समय सुबह - 10:25
गांव- रायपुर मांझा
जिला मुख्यालय से 55 किमी दूर बसा रायपुर मांझा गांव घाघरा नदी के किनारे बसा है। अमर उजाला की टीम गांव पहुंचकर यहां के लोगों से बाढ़ के दर्द को उकेरा तो गांव के गनेश (65) पत्नी प्रभादेवी के साथ नदी पार अपने खेत जाने के लिए गांव के बंधे पर बैठे थे। वह नांव का इंतजार कर रहे थे। गनेश ने बताया कि 6वीं पीढ़ी बाढ़ की तबाही देख रही है। उजड़ना-बसना तो उनकी किस्मत में ही है। बाढ़ के कारण साल में केवल एक फसल गेहूं की ही हो पाती है। बाढ़ का दंश झेल कर परेशान हो चुुके उनके तीन बेटे तो अपने परिवार के साथ दिल्ली व गाजियाबाद में रहकर मजूदरी करने लगे। अब उनकी जिद्द है कि सड़क पर जमीन खरीदने का इंतजाम हो जाने के बाद ही वापस आएंगे। इसी गांव की शोभावती गेहूं धूल कर सुखा रही थी। पूछने पर बताया कि बाढ़ आने से पहले खाने के लिए राशन तैयार करना भी जरूरी है। बाकी का राशन तो रिश्तेदारों के यहां रखवा दिया। पति सुरेश व गुल्ले सामान बटोरने की तैयारी में लगे थे। इनके बेटे भी मुंबई व चंडीगढ़ में रहकर मेहनत मजदूरी करते है। उधर, गांव के त्रिभुवन बंधे पर अपने रहने का आशियाना बनाने के बाद गांव में झोपड़ी में बैठे थे। वह बोले कि अब बाढ़ का पानी आते ही चरपाई लेकर बंधे पर पहुंचना है।
विज्ञापन


समय-11:20
गांव- परसावल
जिला मुख्यालय से 60 किमी दूर घाघरा के किनारे 5 किमी में फैला परसावल गांव में सुबह बंधे पर धर्मराज व गजराज छप्पर तैयार कर रहे थे। इसी गांव के नकछेद घर के बाहर मडहा में बैठकर रिश्तेदारी में सामान रखने गए बेटे पृथ्वी व माधव का इंतजार कर रहे थे। उनका कहना है कि हर वर्ष बाढ़ की पीड़ा सहन उनकी आदत बन गई। सरकारी सहायता तो मिलने से रही। इसलिए अब पहले से अपनी तैयारी कर तबाही से बचने की तैयारी की जा रही है। नकछेद ने बताया कि अब तो उनके लड़के सयाने हो गए हैं। जब छोटे थे तो उनको मां के साथ रिश्तेदारी में भेजना पड़ता था। बाढ़ की तबाही से वह कई साल पीछे हो गए हैं। इसी गांव मवेशी चरा रहे राघव ने बताया कि उनके जानवरों को अभी तक टीके भी नहीं लगे। एक दिन गांव में टीम तो आई। मगर, नाम लिखकर चली गई। उनकी तीन भैंस व उनके दो बच्चे हैं। हालांकि उन्होंने बाढ़ से बचाव के बारे में पूछने पर बताया कि बंधे पर ठिकाना बनाया जा रहा है। बस ईश्वर से बांध बचाने की दिन रात मन्नत मांगता हूूं। तो साइकिल से बाजार जा रहे राकेश ने बताया कि उनके यहां बाजार भी 10 किमी दूर गोंडा जिले के सहाबपुर में है। अब घाघरा को पानी बढ़ रहा है बाढ़ आने में देर नही। इसलिए पहले ही सामान लाने जा रहा हूं।

समय-12:55
गांव-नैपुरा
जिला मुख्यालय ये 50 किमी चरसढ़ी बांध व घाघरा के बीच बसा नैपुरा गांव में अमर उजाला की टीम पहुंची तो रामतीरथ का कक्षा दो में पढ़ने वाला बेटा साहबदीन मडहा के बाहर खड़ा घाघरा की ओर देख रहा था। अपनी मां फूलमती को घाघरा का पानी गांव में आने की बात कहकर उंगली उठाकर दिखा रहा था। बस उसके घर से करीब 500 मीटर दूर घाघरा अपने तेवर दिखा रही थी। पूछंने पर साहबदीन ने बताया कि गांव के स्कूल में मास्टर नही आते तो वह शाहबपुर गोंडा मांटेसरी स्कूल में जाता है। उसके पिता रामतीरथ सामन लेकर बंधे पर गए थे। गांव के ही सत्यनाम ने बताया कि प्रधान भी कोई मदद नहीं करते। हर वर्ष बाढ़ से तबाही का दंश झेलने के बाद भी कोई स्थाई हल नहीं निकल रहा। बांध बनने से उम्मीद जगी थी। मगर, पिछली बार कट गया तो दोबारा दुरुस्त नहीं किया गया। ऐसे में बस एक-दो दिन में ही पानी गांव में पहुंच जाएगा। पोलिया ड्राप पिलाने जा रहे गांव के ही कृष्णगोपाल ने बताया कि बंधे पर रहने के लिए छप्पर का इंतजाम हो गया है। बस अभी सामना ले जाना बचा है। बस पोलिया पिलाकर जैसे ही छुट्टी मिले सबसे पहले सामाना ही पहुंचाना है। गुड्डू यादव भी गांव के बाहर खडे़ होकर घाघरा को निहार रहे थे।

बाढ़ से पीड़ित पर उज्ज्वला के सिलेंडर से राहत
तराई में बसे रायपुर मांझा, परसावल व नैपुरा की महिलाएं बाढ़ से पीड़ित हैं पर वह बोली इस बार मोदी के सिलेंडर से उनको बाढ़ में काफी राहत मिलेगी। गैस सिलेंडर पहले से ही भरा रखा है। ऐसे में लकड़ी व कंडे को लेकर होने वाली दिक्कत इस बार नही होगी। सुशीला कहती है कि बाढ़ में रोटी पकाने के लिए लकड़ी की दिक्कत नही होगी। अगर छप्पर पर भी खाना पकाना हुआ तो गैस चूल्हा है। रामावती बताती है कि पिछले साल तो लकड़ी व कंडे की कमी से 4 दिन तक बिना खाए रहे। केवल बसे राहत शिविर पर कुछ मिलने का सहारा था। मगर, इस बार खाने की दिक्कत नहीं होगी।

तीन दशक से जागकर बिताते हैं बाढ़ की रात
नैपुरा गांव के सियाराम व परसावल के गनेश की 6 पीढ़ी बाढ देख चुकी है। उनका कहना है कि वह करीब 30-32 साल से बाढ़ की रात में कभी नही सोए। रात जाग की ही बिताई। उनका कहना है कि बाढ अक्सर रात व भोर के समय तबाही मचाती है। ऐसे में वह नही सोते। दिन में घंटे-दो घंटे की नींद लेकर काम चलाते है। इन बुर्जुगों का कहना है कि अब के बच्चे व महिलाएं भूख के मारे रह नही सकती। मगर, उन लोगों ने बाढ़ का पानी पीकर 18 दिन बिताए है।
विज्ञापन


तराई क्षेत्र की दुकानों पर तैयार हो रही नाव
तराई में बसे गनेशुपर में शुऐब सन 1980 से नाव बनाने का काम करते हैं। बाढ़ से पहले इस बार भी वह नाव बना रहे है। एक नाव तैयार रखी है तो दूसरी बनाई जा रही थी। सुऐब ने एक कारीगर और लगा रखा है। जिससे काम जल्दी हो जाता है। उनके यहां 10 हजार से लेकर 16 हजार रुपए तक की कीमत की नाव बेची जाती है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें