बाराबंकी। कोरोना का कहर अभी थमा नहीं कि डेंगू ने भी पांव पसार लिए हैं। मगर, जिला अस्पताल से लेकर सीएचसी तक डेंगू से बचाव के नाम पर सिर्फ वार्ड और कुछ बेड आरक्षित कर दिए गए हैं। निजी अस्पतालों में डेंगू के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। बुधवार को जिले के सरकारी अस्पतालों में एक भी डेंगू का मरीज भर्ती नहीं था। संचारी रोग से निपटने के लिए अक्टूबर भर अभियान चला पर साफ-सफाई और छिड़काव का दावा हवा-हवाई ही रहा।
निजी अस्पताल डेंगू के संदिग्ध मरीजों के आने की बात तो स्वीकार करते हैं पर एलाइजा रिपोर्ट के बिना कुछ भी बोलने को तैयार नहीं हैं। यह हालात तब है जब तीन लोगों की जान जा चुकी है और सैकड़ों लोग लखनऊ में इलाज करा रहे हैं। संचारी रोग के नोडल अफसर जिले में अब तक डेंगू के 25 मरीज और एक की मौत की बात स्वीकार रहे हैं।
जिले में डेंगू के मरीजों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। मगर, सीएचसी से जिला अस्पताल तक डेंगू की जांच व उपचार के पर्याप्त इंतजाम न होने से मरीजों को निजी व लखनऊ के अस्पतालों में भर्ती कराना मजबूरी बना है। जिले में अब तक डेंगू से तीन लोगों की जान जा चुकी है। बचाव के लिए ना तो कहीं छिड़काव दिखता है और न ही साफ-सफाई के इंतजाम हैं। इसके बाद भी स्वास्थ्य विभाग का दावा है कि हर जगह डेंगू वार्ड बनाए गए हैं।
लार्वा रोधी कीटनाशक का छिड़काव कराया जाता है। जहां पॉजिटिव केस मिले हैं, वहां आसपास के लगभग 50 घरों में छिड़काव भी कराया गया है। बुधवार को रियलटी चेक में जिले की किसी भी सीएचसी पर डेंगू की जांच किट नही पहुंची थी। न ही कोई मरीज पाया गया है। इसके पीछे जो तथ्य सामने आए, उसमें यह पाया गया कि लोग निजी अस्पतालों में जाने को मजबूर हैं। बस दिखावे के लिए दो-तीन बेड आरक्षित कर डेंगू से निपटने की तैयारियों का दावा सीएचसी के अधीक्षक कर रहे हैं।
जिला अस्पताल के अधीक्षक व पैथालॉजी प्रभारी एसके शुक्ल ने बताया कि प्रतिदिन करीब 15 रैपिड डायनॉस्टिक टेस्ट किट से जांच की जाती है। संदिग्ध मरीजों की जांच का सैंपल एलाइजा जांच के लिए लखनऊ संचारी विभाग भेजा जाता है। अब तक छह केस पॉजिटिव आए हैं। जो इलाज के बाद स्वस्थ हैं। दो दिन की रिपोर्ट अभी नहीं आई है।
जिले में रैपिड डायनॉस्टिक टेस्ट किट से जांच जिला अस्पताल में हो रही है। जल्द ही सीएचसी पर यह किट उपलब्ध करा दी जाएगी। अब तक की एलाइजा रिपोर्ट में 25 केस पॉजिटिव पाए गए हैं। एक व्यक्ति की जान गई है। लोगों को जागरूक किया जा रहा है कि वह पानी एकत्रित न होने दें। इलाज के साथ ही सबसे ज्यादा इसका बचाव ही तरीका है।
- डॉ. डीके श्रीवास्तव, नोडल अधिकारी, संचारी रोग विभाग