बांदा। कालिंजर दुर्ग को पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने की सीएम की घोषणा के बाद वन विभाग भी तैयारी में जुट गया है। कालिंजर दुर्ग से सटे लगभग 2300 हेक्टेयर जंगल को ईको टूरिज्म के रूप में विकसित करने की योजना है। इसमें पर्यटकों को ट्रैकिंग (पहाड़ में चढ़ने) सहित विभिन्न खेल की सुविधाएं मिलेंगी। साथ ही वन्य जीवों का लुत्फ भी ले सकेंगे।
हाल ही में यहां कालिंजर महोत्सव का शुभारंभ करने आए मुख्यमंत्री ने नरैनी तहसील क्षेत्र के कालिंजर में विंध्य पर्वत में स्थित ऐतिहासिक अजेय दुर्ग को पुरातत्व और पर्यटन विभाग को समन्वय स्थापित कर इसे विकसित करने के निर्देश दिए थे। दोनों विभाग पर्यटकों के लिहाज से इसे विकसित करने की तैयारी में जुट गए हैं। दूसरी तरफ किले से सटे जंगल को विकसित करने की कवायद भी शुरू हो गई है। 2300 हेक्टेयर में फैला यह जंगल यूपी-एमपी सीमा को जोड़ता है। टाइगर रिजर्व पार्क भी इसी जंगल से सटा है। हालांकि एहतियाती व्यवस्थाओं के तहत खूंखार जीव कालिंजर के जंगल में नहीं आ पाते। लेकिन अब वन विभाग इसे विकसित करने की तैयारी में है।
वन विभाग के मुताबिक कालिंजर दुर्ग घूमने आने वाले पर्यटक जंगल का भी लुत्फ ले सकें, इसके लिए किले के आसपास फैले पूरे जंगल को ईको टूरिज्म के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव है। यह शासन को भेजा जा चुका है। मंजूरी और बजट मिलते ही इसे विकसित करने का काम शुरू हो जाएगा। जंगल में पर्यटकों के मनोरंजन के लिए विभिन्न सुविधाएं होंगी। पर्यटकों के रुकने के लिए जंगल में हट बनेंगे। ट्रैकिंग और नेचुरल मेडिटेशन (योग व ध्यान) की व्यवस्था होगी।
अध्यात्म और इतिहास से जुड़ा है कालिंजर
बांदा। ऐतिहासिक अजेय दुर्ग कालिंजर अध्यात्म और इतिहास से जुड़ा है। विंध्य पर्वत पर करीब 800 फीट ऊंचाई पर झाडि़यों के बीच स्थित कालिंजर किले को कालजयी यानी काल का क्षय कहा जाता है। माना जाता है कि कालिंजर को सतयुग में कीर्ति नगर, त्रेतायुग में मध्यगढ़, द्वापर में सिंहलगढ़ और कलियुग में कालिंजर नाम से मशहूर है। कालिंजर का उल्लेख वेदों, पुराणों, उप निषदों और तमाम प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। पद्म पुराण में इस क्षेत्र को नवखल कहा गया है। इसे विश्व का सबसे प्राचीन स्थल बताया गया है। किवदंती है कि जब समुद्र मंथन हुआ तो उससे 14 रत्न निकले। उन रत्नों में कालकूट नामक विष भी निकला। इसे पीने के लिए न देवता तैयार थे और न दानव। बाद में भगवान शिव ने इस विष को अपने कंठ में धारण किया। भगवान शिव ने कालिंजर पर्वत पर ही रुक कर तपस्या की और कालकूट की ज्वाला शांत की। यहां अति प्राचीन नीलकंठ मंदिर है, जो उन्हीं के नाम पर है।
मिलेगा युवाओं को रोजगार
बांदा। इंटक चैप्टर की को-कनवीनर डा. शबाना रफीक का कहना है कि आध्यात्मिक और ऐतिहासिक महत्व रखने वाले कालिंजर दुर्ग के आसपास फैले जंगल के विकसित होने के बाद यहां पर्यटन को और बढ़ावा मिलेगा। जिस तरह पन्ना के टाइगर रिजर्व पार्क का लुत्फ लेने के लिए खजुराहों से पर्यटक आते हैं उसी तरह कालिंजर दुर्ग आने वाले पर्यटकों को भी जंगल का भरपूर मजा मिल सकेगा। वन विभाग द्वारा इसे विकसित करने का प्रस्ताव सराहनीय है। स्थानीय लोगों को रोजगार मिल सकेगा। गाइड की भूमिका के साथ पर्यटकों को घुमाने के लिए वाहन आदि की व्यवस्था पर बड़ी संख्या में युवाओं को रोजगार मिलेगा।
कालिंजर दुर्ग के ईदगिर्द करीब 2300 हेक्टेयर में जंगल फैला है। यह जंगल एमपी को भी जोड़ता है। तमाम कीमती औषधियां जंगल में स्थित हैं। कई दुर्लभ प्रजाति के वन्य जीव हैं। इसे विकसित करने का प्रस्ताव शासन को भेजा गया है। जंगल में पर्यटकों के रुकने के लिए हट बनेंगे। पहाड़ में चढ़ने के लिए ट्रैकिंग, बोटिंग आदि की भी व्यवस्था करने का प्रस्ताव है।
- संजय अग्रवाल प्रभागीय वनाधिकारी, बांदा।