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बांदा : आजादी की लड़ाई में क्रांतिकारियों गढ़ था भूरागढ़, 1858 में अंग्रेजों से युद्ध में शहीद हुए थे तीन हजार क्रांतिकारी

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भूरागढ़ दुर्ग में क्रांतिकारियों की स्मृति में बना स्तंभ स्मारक। - फोटो : BANDA
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बांदा। बुंदेलखंड के ऐतिहासिक शहर बांदा में केन नदी किनारे स्थित भूरागढ़ दुर्ग स्वतंत्रता संग्राम की अनेकों यादें संजोए हुए है। क्रांतिकारियों का गढ़ था भूरागढ़ किला। जंगे आजादी में जान देने वालों की स्मृति में यहां स्मारक भी बनाया गया है। 14 जून 1857 को अंग्रेजों के खिलाफ यहां युद्ध का आगाज हुआ। इसका नेतृत्व नवाब अली बहादुर द्वितीय ने किया। यूपी और बिहार के क्रांतिकारी भी इसमें शामिल हुए। इसी दौरान क्रांतिकारियों ने तत्कालीन ज्वाइंट मजिस्ट्रेट काकरोल की 15 जून 1857 को हत्या कर दी थी।
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16 अप्रैल 1858 को अंग्रेज अफसर व्हिटलक का बांदा आगमन हुआ। उसका बांदा के क्रांतिकारियों की सेना से आमना-सामना हुआ। इस युद्ध में करीब तीन हजार क्रांतिकारी शहीद हुए। हालांकि बांदा गजेटियर में सिर्फ 800 के शहीद होने की बात दर्ज है। इन्हीं शहीदों में 28 लोगों के नाम भूरागढ़ दुर्ग के स्मारक शिलापट पर दर्ज हैं। युद्ध में नजदीक के गांवों में रहने वाले नटों ने भी भाग लेकर अपना बलिदान दिया था। तब से भूरागढ़ का किला देशभक्ति और स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारियों की यादगार के रूप में भी जाना जाने लगा। खास बात यह है कि अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध करने वाले क्रांतिकारियों में हर धर्म-मजहब के लोग शामिल थे।
भूरागढ़ दुर्ग स्मारक में दर्ज शहीद क्रांतिकारी
नवाब अली, अकबर बेग गोलन बाग, फरियाज मोहम्मद, छत्ता खां, मुख्तियार मोहम्मद, देवीदीन, कादिर बेग उर्फ बुद्धू, इदरीस मोहम्मद, वेद अली, मोहम्मद अली बेग, रहमत अली खां, पैगाम अली, काले खां, इस्माइल खां, कुतुब अली खां, अय्याम, शेख जुम्मन, विलायत हुसैन, गुलाम हैदर खां, डिप्टी कलक्टर सरदार मोहम्मद (कालापानी), हैदर खां, इमदाद अली, बांदा तहसीलदार मीर फरहद अली, हनुमत राव फत्ते, बाबू राव गोरे, डिप्टी कलक्टर फतेहपुर हिकमत उल्ला खां, तहसीलदार स्योढ़ा उस्मान खां, माल विभाग अधिकारी मिर्जा इमदाद अली बेग आदि।
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नोट- राव महिपत सिंह सुगरा स्टेट के साथ 80 सिपहसालारों को भूरागढ़ दुर्ग में फांसी दी गई।
बुंदेलखंड में क्रांति का गढ़ था भूरागढ़ किला
बांदा नगर पालिका के पूर्व अध्यक्ष वैश्य राजकुमार राज बताते हैं कि 1857 की क्रांति में बांदा का भूरागढ़ किला क्रांतिकारियों का गढ़ बन गया था। रानी लक्ष्मीबाई ने नवाब अली बहादुर को राखी के साथ चिट्ठी भेजकर मदद मांगी थी। क्रांतिकारी झांसी जाने के लिए भूरागढ़ किले में ही इकट्ठा हुए थे। यहां से तीन दिन के अंदर रानी की मदद को झांसी पहुंच गए थे। यह किला आज भी क्रांति का मूक गवाह है। इस दुर्ग को और विकसित व सुरक्षित किए जाने की जरूरत है।
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