हालांकि कुछ इतिहासकारों ने इसे आत्मसमर्पण भी लिखा है। ब्रिटिश सरकार में नवाब के पास से बरामद महिलाओं के जेवरात और 8000 रुपये दिसंबर 1858 में इलाहाबाद के खजाने में जमा कर दिए। नवाब 1873 में बीमार पड़ गए। अंग्रेज सरकार ने उन्हें इलाज के लिए बाहर जाने की अनुमति नहीं दी, लेकिन बनारस नरेश ने अपनी जिम्मेदारी पर नवाब को इलाज के लिए बनारस बुलवा लिया।
वहीं, 27 अगस्त 1873 को नवाब अली बहादुर सानी ने अंतिम सांस ली। इस दौरान वह अपने परिवार से भी दूर रहे। बनारस में ही उनका अंतिम संस्कार किया गया। इस महान स्वतंत्रता सेनानी का मकबरा आज भी बनारस में उनकी याद ताजा करता है। इंदौर में नवाब के परपोते (प्रपौत्र) नवाब जुल्फिकार बहादुर अभी भी सपरिवार आबाद हैं।
नवाब को नहीं मिल सकी उनकी सल्तनत में दो गज जमीन
नवाब परिवार के काफी नजदीकी रहे बांदा शहर के मशहूर मगरबी खानदान के सैय्यद अहमद मगरबी (मुन्ने) बताते हैं कि 1857 की जंगे आजादी के सूरमा नवाब अली बहादुर सानी ने महारानी लक्ष्मीबाई की एक आवाज पर अपनी नवाबी कुर्बान कर दी थी। रानी की सहायता के लिए अपनी सेना के साथ कालपी पहुंचकर मोर्चा संभाल लिया था। अंतिम समय तक वहां उनके साथ रहे। नतीजे में अंग्रेजों ने उन्हें इंदौर में नजरबंद कर दिया। बहादुर शाह जफर की तरह नवाब अली बहादुर को भी बांदा में दो गज जमीन दफन के लिए न मिल सकी। सैय्यद अहमद कहते हैं कि ऐसे वीर सपूत पर हम सभी बांदा के बाशिंदों को गर्व है।