बांदा। करीब 20 लाख आबादी वाले जिले के सरकारी अस्पतालों में हृदय रोग और किडनी के मरीजों के इलाज के लिए विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं हैं। रानी दुर्गावती मेडिकल कॉलेज को शुरू हुए छह साल हो गए हैं, लेकिन अभी तक किडनी और हृदय रोग विशेषज्ञों की तैनाती नहीं हुई है।
मेडिकल कॉलेज और जिला अस्पताल में पीपीपी मॉडल पर डायलिसिस यूनिट संचालित हैं, पर नेफ्रोलॉजिस्ट नहीं है। डायलिसिस की जिम्मेदारी टेक्नीशियन संभाल रहे हैं। मेडिकल कॉलेज की शुरुआत वर्ष 2016 में हुई थी। वर्तमान में यहां 500 एमबीबीएस छात्र-छात्राएं अध्ययनरत हैं।
चित्रकूटधाम मंडल के बांदा सहित महोबा, हमीरपुर व चित्रकूट और मध्य प्रदेश के पन्ना व छतरपुर जिले तक के मरीज यहां इलाज के लिए आते हैं। हैरत की बात यह है कि छह साल में अब तक यहां हार्ट स्पेशलिस्ट (हृदय रोग विशेषज्ञ) और नेफ्रोलॉजिस्ट की नियुक्ति नहीं हुई। इन रोगों के मरीजों को कानपुर, लखनऊ और प्रयागराज की दौड़ लगानी पड़ती है। हृदय रोगियों की जांच के नाम पर सिर्फ ईसीजी की व्यवस्था है।
मेडिकल कॉलेज प्राचार्य डॉ. मुकेश कुमार यादव ने बताया कि दोनों रोगों के विशेषज्ञों की तैनाती के लिए कई बार शासन को पत्र भेजा गया, लेकिन अब तक नियुक्ति नहीं हुई। रोजाना 8-10 हृदय रोगी इलाज के लिए आते हैं। इनमें दो-तीन गंभीर मरीज होते हैं, जिन्हें सुविधाओं के अभाव में रेफर करना मजबूरी है। इसी तरह नेफ्रोलॉजिस्ट नहीं है।
पीपीपी (प्राइवेट पब्लिक पार्टनरशिप) के तहत दो बेड का डायलिसिस यूनिट संचालित है। लखनऊ और कानपुर के नेफ्रोलॉजिस्ट की ऑनलाइन सलाह पर यूनिट के दो टेक्नीशियन मरीजों की डायलिसिस करते हैं। गंभीर रोगियों को रेफर कर दिया जाता है।
जिला अस्पताल के सीएमएस डॉ.एसएन मिश्रा ने बताया कि दो साल पूर्व हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. केएल पांडेय के सेवानिवृत्त होने के बाद से यह पद रिक्त खाली है। फिजीशियन डॉ. शिशिर चतुर्वेदी फिलहाल हृदय रोगियों को देख रहे हैं। जांच के नाम पर सिर्फ ईसीजी की व्यवस्था है।
यहां रोजाना 25-30 हृदय रोगी ओपीडी में आते हैं। जांच के आधार पर 7-8 गंभीर रोगियों को रोजाना रेफर किया जाता है। साथ ही अस्पताल परिसर में 10 बेड का डायलिसिस यूनिट है। यहां तीन टेक्नीशियन तैनात हैं। मरीजों की मुफ्त डायलिसिस होती है, लेकिन नेफ्रोलॉजिस्ट न होने पर यूनिट से संबद्ध नेफ्रोलॉजिस्ट की सलाह के बाद तीन टेक्नीशियन मरीजों की डायलिसिस करते हैं।
कानपुर से इलाज पर खर्च हो गए डेढ़ लाख
महोबा निवासी सगीर अंसारी किडनी के मरीज हैं। यूनिट में भर्ती कर उनकी डायलिसिस की गई। पत्नी मीना ने बताया कि पति का इलाज कानपुर में चल रहा है। डेढ़ लाख रुपये से ज्यादा खर्च हो चुका है। आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। कानपुर में प्राइवेट अस्पताल में हर बार डायलिसिस में लगभग 5,000 रुपये खर्च होते थे। यहां मुफ्त डायलिसिस होने पर राहत मिली है। दिखाने के लिए अभी भी कानपुर ही जाना पड़ता है।
हृदय का नहीं है इलाज, तुरंत करते रेफर
डिग्गी चौराहा निवासी शंकर पासवानी हृदय रोग से पीड़ित हैं। ब्लड प्रेशर (बीपी) के साथ उनकी धड़कन बढ़ी रहती है। मेडिकल कॉलेज और जिला अस्पताल में दिखाया, लेकिन दोनों ही स्थानों पर फिजीशियन ने ईसीजी कर चेक किया। पांच-पांच दिन की दवा लिखी, पर कोई आराम नहीं मिला। अंतत: कानपुर दिखाने की सलाह दे दी गई।
डायलिसिस यूनिट में भर्ती मरीज।- फोटो : BANDA