बलरामपुर। नेपाल से आने वाले सात नालों के पानी को संरक्षित करने वाला चित्तौड़गढ़ जलाशय को संरक्षण की दरकार है। साल 1978 में बांध के निर्माण की नींव रखी गई और 1997 में बांध तैयार हो सका। इसके बाद से अब तक इसमें जमा सिल्ट की सफाई कभी भी उचित तरह से नहीं हुई है। इससे जलाशय में पानी का बहाव सही ढंग से नहीं हो पा रहा है।
निगरानी में ढिलाई से चित्तौड़गढ़ जलाशय से जुड़े बांधों पर कई जगह अतिक्रमण ने भी हालत बिगाड़ रखे हैं। बढ़ते अतिक्रमण व सिल्ट की सफाई न होने से जलाशय में अब नेपाल से आने वाले पानी के संरक्षण की क्षमता भी कम होने लगी है। 11 किलोमीटर लंबे बांध के 194 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में 35.6 मिली घनमीटर जल ग्रहण करने की क्षमता है, जिसमें से 31.97 मिली घनमीटर का प्रयोग किसानों की खेती के लिए हो सकता है। जिला आपदा अधिकारी अरुण सिंह ने भी चितौड़गढ़ जलाशय के विकास व संरक्षण की जरूरत जताई है।
सदाबहार है जलाशय की छटा
भारत-नेपाल सीमा पर स्थित पिपरी बानगढ़ में बना चित्तौड़गढ़ जलाशय प्रकृति की एक अनमोल सौगात है। यह जलाशय नेपाल व भारत के पहाड़ी नालों के एक संगम स्थल की तरह है। इसमें पहाड़ी नाला भांभर, दारा, मूसी, घुघरौर व हमसोटी नाका समेत कई छोटे नालों का पानी एकत्र होता है। नेपाल के पानी को संग्रहित करने वाला यह जलाशय भारत के लिए सुरक्षा कवच भी है। साथ ही जलाशय का अनुपयोगी पानी किसानों के फसलों की सिचाई के लिए भी मुफीद होता है। पर्यटन की दृष्टि से भी जलाशय का अपना स्थान है और सभी मौसम में यहां पड़ोसी राष्ट्र नेपाल व स्थानीय पर्यटक आते रहते हैं। सर्दियों में विदेशी पक्षियों का प्रवास भी जलाशय की खूबसूरती को बढ़ा देता है।
अधिशासी अभियंता चितौड़गढ़ बांध परियोजना अखिलेश सिंह ने बताया कि चितौड़गढ़ बांध को संरक्षित करने के लिए विभाग हमेशा प्रयासरत रहता है। बजट मिलने पर काम कराए जाते रहे हैं, जल्द ही इसके विकास के लिए विशेष प्रयास होंगे।