बलरामपुर। 72 हजार से अधिक मतदाता वाली बलरामपुर नगर पालिका परिषद की सीट पर 23 साल बाद भाजपा ने वापसी की है। जिला सृजन के बाद हुए चुनाव में पहली बार भाजपा का कमल शहर में खिला है। यहां से भाजपा के धीरेंद्र प्रताप सिंह धीरू ने धमाकेदार जीत हासिल की है। मुस्लिम मतों में बिखराव को इसके पीछे की मुख्य वजह मानी जा रही है।
बलरामपुर नगर पालिका परिषद का गठन आजादी के पहले वर्ष 1887 में हुआ था। पहले 16 साल तक यहां पर अंग्रेज चेयरमैन थे। इसके बाद बलरामपुर राज परिवार ने अध्यक्ष पद की बागडोर संभाली। 1953 में पहली बार चेयरमैन पद के लिए हुए चुनाव में बलदेव प्रसाद सैलानी ने जीत हासिल की थी। उस वक्त बलरामपुर सीट गोंडा जिले में शामिल थी। 1995 में भाजपा की कुुसुम चौहान ने जीत हासिल की थी। उन्होंने सपा के जावेद हसन को हराया था।
वर्ष 2002 के चुनाव में भाजपा ने प्रत्याशी बदल कर एसबी सिंह को मैदान में उतारा था, वह चुनाव हार गए। इस चुनाव में सपा के जावेद हसन ने जीत हासिल की थी। 2006 में भाजपा ने कुसुम चौहान को दोबारा मैदान में उतारा, लेकिन सपा के जावेद हसन ने उन्हें हराकर जीत हासिल की थी। वर्ष 2012 के चुनाव में भाजपा के परमजीत सिंह को हराकर जावेद हसन ने सपा से फिर जीत हासिल की।
वर्ष 2014 में उनके निधन के बाद हुए उपचुनाव में उनकी पत्नी इशरत जमाल ने केडी शुक्ला को हराकर जीत हासिल की। वर्ष 2017 के चुनाव में कुल 14 उम्मीदवार थे। इसमें बसपा की किताबुन्निशां ने जीत हासिल की थी। इस चुनाव में भाजपा की मीना सिंह दूसरे नंबर व सपा की इशरत जमाल तीसरे नंबर पर थीं।
2023 के चुनाव में भाजपा ने धीरेंद्र प्रताप सिंह धीरू को पहली बार चुनाव मैदान में उतारा। उन्होंने बसपा के शाबान अली को हराकर जीत हासिल की। सपा यहां पर तीसरे नंबर पर रही। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि मुस्लिम मतों का बिखराव व अन्य वोटरों के एकजुट होना ही मुख्य वजह इसका आधार बना।