बलरामपुुर। 25 लाख की आबादी वाले इस जिले में दिल के रोगियों को इलाज नहीं नसीब हो रहा है। जिले के अस्पतालों में एक भी कार्डियोलाजिस्ट तैनात नहीं है। सीने में दर्द हो या हार्ट अटैक, मरीजों को इलाज के लिए गोंडा या लखनऊ जाना पड़ता है। जिम्मेदार अधिकारी शासन को पत्र भेजकर अपनी जिम्मेदारियों की इतश्री कर लेते हैं।
11 मई 1997 को गोंडा से अलग होकर बलरामपुर नया जनपद बना था, लेकिन तब से 25 साल बीतने के बाद भी यहां के लोगों को दिल के दर्द का इलाज नहीं मिला। हृदय रोग विशेषज्ञ सहित अन्य विशेषज्ञ डॉक्टरों की तैनाती के लिए आंदोलन भी हुए, लेकिन यहां कार्डियोलाजिस्ट की तैनाती नहीं हो सकी। आंकड़ों की अनुसार दोनों जिला अस्पताल से प्रतिदिन चार से पांच हृदय रोगियों को गोंडा या लखनऊ रेफर किया जाता है।
नहर बालागंज स्थित संयुक्त जिला चिकित्सालय में कार्डियोलाजिस्ट का एक पद सृजित है, लेकिन अस्पताल बनने के बाद से अब तक उस पर किसी डॉक्टर की तैनाती नहीं हुई। जबकि संयुक्त जिला चिकित्सालय में प्रतिदिन दो-तीन हृदयरोगी आते हैं, जिन्हें गोंडा या लखनऊ रेफर कर दिया जाता है।
सीएमओ डॉ. सुशील कुमार का कहना है कि नियमित कार्डियोलाजिस्ट समेत अन्य विशेषज्ञ डॉक्टरों की तैनाती के लिए शासन को पत्र भेजा जा चुका है।
सिविल लाइंस निवासी मिथिलेश कुमार बताते हैं कि उनके पिता लक्ष्मी नारायण दिल के मरीज थे। 15 फरवरी 2022 की देर रात अचानक उनके सीने में तेज दर्द उठा, लेकिन समय पर इलाज नहीं मिलने से उनकी मौत हो गई। मिथिलेश का कहना है कि यदि जनपद के किसी अस्पताल में हार्ट स्पेशलिस्ट की तैनाती होती तो शायद उनकी जान बच जाती।