बलरामपुर। दीपावली नजदीक आने के साथ ही कुम्हारों की चाक ने रफ्तार पकड़ ली है। आधुनिक झालरों के बीच दीयों का महत्व भी कम नहीं है। परंपरा के अनुसार सभी घरों में मिट्टी के दीयों से ही पूजा करने का विधान है। यही कारण है कि कुम्हार दिन-रात दीये बनाने में जुटे हैं। दो साल बाद कोरोना के खौफ से बाहर निकलकर मनाई जा रही दीपावली में बेहतर बिक्री की आस कुम्हारों में उत्साह भर रही है।
आधुनिक युग में दीपावली पर बिजली की रंग-बिरंगी झालरों के बीच दीयों का भी अपना महत्व है। मिट्टी के दीयों को घर में जलाने व सजाने का रिवाज आज भी कायम है। यही कारण है कि दीपावली आते ही कुम्हार दिन-रात मिट्टी के दीये बनाने में जुटे हैं। शारदीय नवरात्र समाप्त होने के बाद ही दीप पर्व के लिए बड़े पैमाने पर दीये, खिलौने, तराजू, मटका, भोंपू आदि बनाने, पकाने व रंगाई का काम तेजी पकड़ लेता है।
सब्जी मंडी वार्ड के वारिस ने बताया कि पिछले वर्षों के मुकाबले इस बार मिट्टी के बर्तन व दीये तैयार करने में अधिक खर्च आ रहा है। पहले चाक को हाथ से चलाकर मिट्टी के दीये बनाए जाते थे और अब इलेक्ट्रानिक चाक पर दीये तैयार किए जाते हैं। इलेक्ट्रानिक चाक पर आसानी से और कम समय में अधिक दीये बन जाते हैं।
हालांकि बिजली का बिल बढ़ने के कारण दीये के दाम बढ़ाने पड़ रहे हैं। पिछले साल जहां 80 से 90 रुपये सैकड़ा दीये बिकते थे वहीं, इस बार 150 रुपये सैकड़ा तक दीये बिकने की संभावना है। इसी तरह तुलसीपुर, गैसड़ी, उतरौला, सादुल्लाहनगर, रेहरा बाजार आदि क्षेत्रों में भी मिट्टी के बर्तन तैयार करने वाले कुम्हारों के घरों में माटी के दीप व अन्य सामग्री बनाने का काम अंतिम दौर में है।