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Ballia News: सहजता, सौम्यता और सादगी की प्रतिमूर्ति थे केदारनाथ

Sat, 18 Mar 2023 11:31 PM IST
वाराणसी ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बलिया
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बैरिया। विनम्रता, सहजता, सौम्यता, सहृदयता, सादगी, साहस, सत्कर्म एवं समरसता की प्रतिमूर्ति बलिया की माटी के लाल तार सप्तक के कवि डा. केदारनाथ सिंह की कालजयी कृतियां सदैव उनको हमारे समक्ष रखेंगी। 19 मार्च 2018 को यह कालजयी कवि हमेशा के लिए चिरनिद्रा में सो गया था, लेकिन दिलों में आज भी जिंदा हैं।

डा. केदारनाथ सिंह का मूल गांव चकिया था। यहां 7 जुलाई, 1934 को उनका जन्म हुआ। प्रारंभिक शिक्षा उन्होंने अपने गांव से ही पर्याप्त की। इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए काशी का चयन किया। उदय प्रताप कालेज से बीए करने के बाद काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से एमए एवं पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। 1964 में उन्हें आधुनिक हिन्दी कविता में बिंब विधान नामक विषय पर विद्या वारिधि की उपाधि मिली। 1950 के बाद से ही उन्होंने कविता का सृजन प्रारंभ कर दिया और 1954 में उन्होंने स्वतंत्रता शीर्षक से पाल एलुअर की कविता का हिन्दी में अनुवाद किया, जहां से वे बेहद चर्चित हुए।
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प्रारम्भ में केदारनाथ सिंह ने उदित नारायण कालेज पडरौना, सेण्ट एण्ड्रूज कालेज गोरखपुर, उदय प्रताप कालेज, वाराणसी, गोरखपुर विश्वविद्यालय गोरखपुर आदि स्थानों पर शिक्षण किया। इसके बाद, उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली को अपना कार्यक्षेत्र बनाया। शिक्षक के रूप में अध्यापन करते हुए हिन्दी विभाग के अध्यक्ष पद को भी विभूषित किया और यहीं से अवकाश ग्रहण किया। 1989 में उन्हें अकाल के सारस नामक कविता संग्रह के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ। कविता संग्रह का अंग्रेजी संस्करण भी प्रकाशित हुआ, जो बेहद लोकप्रिय हुआ। उन्हें मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार, व्यास सम्मान, जाशुआ समयमान, भारत भारती पुरस्कार, दिनकर पुरस्कार, जीवन भारती पुरस्कार एवं ज्ञान पीठ पुरस्कार से नवाजा गया।

घर और गांव से रखते थे लगाव
बैरिया। डा. केदारनाथ सिंह शहरों में तमाम सुविधाएं उपलब्ध होने के बावजूद वे अपने गांव व रानीगंज बाजार से बहुत ज्यादा लगाव रखते थे। रानीगंज बाजार में मुन्ना शर्मा की दुकान पर बैठकर कहते थे कि हमें तो शहरों में तनिक भी अच्छा नहीं लगता है। गांव में हमारी आत्मा बसती है।
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डा. केदारनाथ सिंह जब भी गांव आते थे गांव, वीरान, खेत, खलिहान यहां तक कि वे अपने घर के सामने बह रहे भागड़ नाले को बेनाम की नदी नाम देते हुए उसपर भी किताब लिख दिया। केदारनाथ सिंह के परिवार के लोग यहां रहते नहीं है। क्षेत्र के साहित्य प्रेमी उनके गांव में उनके नाम से संग्रहालय बनाने की मांग करते हैं।
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