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बहती धारा में कैसे चलाएं हल, बोएं बीज

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रामगढ़ क्षेत्र के सुघरछपरा गांव के समीप रुका पड़ा कटानरोधी कार्य। - फोटो : BALLIA
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बलिया। पंद्रह साल पहले 20 बीघे जमीन पर खेती करता था। सिंचाई के लिए नलकूप लगवा लिया था। खेत, बोरिंग सब सरयू नदी में चले गए। बहती धारा में कोई हल कैसे चलाए। गुजर मुश्किल हो गया है। यह कहानी इब्राहिमाबाद नौबरार (अठगांवा) ग्राम पंचायत के ध्रूप सिंह की है। मुरलीछपरा, रेवती, बैरिया के 60 से ज्यादा मौजों के किसानों की कहानी ऐसी ही है। दस्तावेज पर जमीन किसान के नाम से दर्ज है लेकिन सारा खेत नदी में डूबा हुआ है।
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जिले में बाढ़ व कटान एक अभिशाप बन चुकी है। गंगा व सरयू नदी के तटवर्तीय इलाकों के किसान कटान के चलते भूमिहीन होते जा रहे हैं। उनकी हजारों एकड़ उपजाऊ भूमि नदी में समाहित हो चुकी है। कटान में सब कुछ गंवाने वाले किसानों को कोई मुआवजा भी नहीं दिया गया। विकास खंड रेवती, मुरलीछपरा व बैरिया के पांच दर्जन से अधिक मौजों के कई किसान अब केवल कागजों में जमीन के मालिक हैं। सरकारी रिकार्ड के मुताबिक पांच साल में 78.46 हेक्टेयर भूमि नदी में विलीन हो चुकी है। मगर क्षेत्रीय लोगों का कहना है कि सरकारी आंकड़ा आधा-अधूरा है। दरअसल हर साल हर वर्ष 300 हेक्टेयर उपजाऊ जमीन नदियां काट रही हैं। इन ब्लॉकों 60 से अधिक मौजे के 35 हजार आबादी की जीविका का मुख्य साधन खेती व पशुपालन है। बैरिया के मौजा गोपालनगर, वशिष्ठनगर, मांझा, नवकागांव, शिवपुर, अधिसिझुआ, इब्राहिमाबाद नौबरार, चांददीयर, भुसौला, जगदीशपुर आदि गांवों की दो दशक में हजारों एकड़ कृषि भूमि सरयू व गंगा नदियों में विलीन हो चुकी है।
कटान रोकने के करोड़ों रुपये की लागत से ठोकर और बोल्डर डालने के काम कराए जा रहे हैं लेकिन का की सुस्ती के चलते समय से काम पूरा नहीं हो पा रहा है। इब्राहिमाबाद नौबरार (अठगांवा) के नवका टोला पुरवा के बच्चा यादव बताते हैं कि दस साल पहले वे 14 बीघे में खेती करते थे। कागज पर उनके खेत हैं लेकिन असल में नाममात्र की जमीन बची है। कटान में जमीन गई लेकिन सरकार ने कभी सुधि नहीं ली।
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बाढ़ व कटान रोकने के उपाय किए जा रहे हैं। कई परियोजनाओं पर काम चल रहा है। बाढ़ के मद्देनजर तैयारियां कर ली गई हैं।
- आरके सिंह, एडीएम
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