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बिहार से आने वाला अवैध लाल बालू हो रहा वैध

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बलिया। बिहार से आने वाले लाल बालू पर वन विभाग की ओर से की जाने वाली शुल्क वसूली को लेकर सवाल उठने लगे हैं। हैरानी की बात है कि अवैध तरीके से प्रदेश की सीमा में आने वाले लाल बालू को वन विभाग की ओर से महज कुछ रुपए का शुल्क लेकर वैध कर दिया जा रहा है। जबकि अवैध बालू पर जुर्माना लगाने का प्रावधान है। हालांकि यह खेल सबसे अधिक भरौली गंगा पुल के रास्ते है क्योंकि गंगा पुल पर पिछले तीन सालों से भारी वाहनों के आवागमन पर प्रतिबंध है। इसके अलावा नदियों व बैरिया मांझी पुल के रास्ते भी यह गोरखधंधा बदस्तूर जारी है।
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2007-08 में हाईकोर्ट के निर्देश पर वन उपज से अभिवहन व पंजीयन शुल्क वसूल करने के लिए प्रांतीय सीमाओं पर चेकपोस्ट स्थापित किया गया था। वन विभाग की ओर से प्रति चक्कर बतौर पंजीयन 750 रुपए व लाल बालू पर प्रति घन मीटर 75 रुपए वसूली निर्धारित थी। हैरानी की बात है कि किसी भी प्रांतीय सीमा पर वन विभाग की ओर से इसके वजन के लिए कोई इंतजाम नहीं किए गए हैं। सूत्रों की मानें तो हाईकोर्ट का आदेश वन क्षेत्रों में खनित वन उपज पर अभिवहन व पंजीयन शुल्क लेने के लिए वन मार्गोँ पर चेक पोस्ट लगाने का निर्देश दिया लेकिन विभाग ने इसे मनमानी तरीके से लागू किया। जिले में न तो कोई घोषित वन क्षेत्र है और न ही कोई वन मार्ग ही है। इसके अलावा लाल बालू का खनन बिहार प्रांत में होता है जहां रायल्टी जमा की जाती है और प्रदेश की सीमा में लाने के लिए वाणिज्य कर अदा किया जाता है तो ऐसे में अभिवहन व पंजीयन शुल्क को लेकर सवाल उठने लगे हैं। 2012 में वैट लागू होने के चलते चेकपोस्ट को समाप्त कर वन विभाग की ओर से प्रांतीय सीमाओं पर प्रवर्तन दल की तैनाती कर बिहार से आने वाले लाल बालू, कोयला, गिट्टी आदि पर अभिवहन शुल्क वसूल करने का काम जारी रहा।

कोट
हाईकोर्ट के आदेश पर ही प्रांतीय सीमाओं पर वन उपज से अभिवहन व पंजीयन शुल्क की वसूली की जाती है। वन उपज को लेकर अब सुप्रीम कोर्ट की ओर से भी फैसला आ चुका है। किसी भी वाहन से वन उपज ले जाने पर अभिवहन व पंजीयन शुल्क वसूलने का प्रावधान है।
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एनके सिंह, डीएफओ
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