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थके पैर चलने को तैयार नहीं, जेब खाली और मन भारी, लेकिन घर पहुंचने की बेताबी

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बैरिया। लॉकडाउन लागू होने के बाद से मजदूरों का पलायन जारी है। कई दिनों तक बदनसीबी की मार झेल भूखे पेट रह पैदल हजारों कोस की दूरी तय कर अपने गांव पहुंचने का ख्वाब मन में लिए मजदूर निकल पड़े हैं। रोजाना बड़ी संख्या में मजदूर रेल पटरी के सहारे सुरेमनपुर रेलवे स्टेशन व एनएच 31 से गुजर रहे हैं।सुरेमनपुर रेलवे स्टेशन पर 15 से अधिक मजदूर टिन शेड की छांव में आराम करते दिखे। कुछ देर आराम करने के बाद बैग से चूड़ा और गुड़ निकाल खाते हैं, हैंडपम्प पर पानी पी आराम करने के बाद फिर सफर पर निकल जाते हैं। थके पैर एक डेग भी चलने को तैयार नहीं, जेब खाली और मन भारी, लेकिन घर पहुंचने की बेताबी उन्हें रोक नहीं पाती, धीरे धीरे बिहार की तरफ कदम उठ जा रहे हैं। सरकार का दावा है कि कोई भूखे नहीं सोएगा लेकिन भूखों को यकीन नहीं हो रहा है लिहाजा यह मजदूर जौनपुर से बिहार के कटिहार के लिए 700 किलोमीटर पैदल ही निकल पड़े। चार दिनों में यह 200 किमी की दूरी तय कर दया छपरा के पास गजहवा बाबा के स्थान पहुंचे जहां कुछ लोगों की नजर पड़ी तो उन्हें खाने के लिए दिया। पेट में अन्न जाते ही उनके चेहरे पर खुशी और सकून के भाव झलकने लगे। पैदल सफर करने वाले मुहम्मद शौकत, नेक मुहम्मद, मुहम्मद अनवर हुसैन आदि ने बताया कि वे कटिहार के रहने वाले हैं। जौनपुर में ठेकेदार के माध्यम से रेलवे में काम करते थे। लेकिन लॉकडाउन के बाद ठेकेदार ने अपना फोन बंद कर लिया। कुछ दिनों तक किसी गुजारा किए लेकिन कुछ पैसा बचा तो चूड़ा और गुड़ खरीद कर गांव के लिए चल पड़े। शम्भू मंडल, हरेन्द्र महतो, जितेंद्र मंडल ने बताया कि अपने पेट की भूख मिटाने के लिए कमाने गए थे लेकिन उन्हें वहां से जान बचा कर निकलना पड़ा। अतुल चौधरी व बासुदेव महतो ने कहा कि हम लोग दिन भर चलते हैं जहां थकान महसूस होता है वहीं किसी पेड़ के नीचे गमछा बिछा कर सो जाते हैं।
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