बलिया। भिखारी ठाकुर अपने जीवन काल में ही लीजेंड बन चुके थे। अपने नाटकों के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों और विडम्बनाओं पर जमकर कुठाराघात किया। उन्होंने समाज को एक नई दिशा दी। भिखारी ठाकुर भोजपुरी साहित्य, कला और संस्कृति के सच्चे उन्नायक थे। उक्त बातें जनपद के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. जनार्दन राय ने भिखारी ठाकुर की पुण्यतिथि पर आयोजित विचार गोष्ठी में कहीं। संकल्प साहित्यिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्था की ओर से रविवार को दिन में एक बजे से मिश्र नेवरी स्थित कार्यालय पर पुण्यतिथि मनाई गई। सचिव एवं रंगकर्मी आशीष त्रिवेदी ने कहा कि भिखारी ठाकुर एक सांस्कृतिक योद्धा थे। उन्होंने समाज मे परिवर्तन लाने के लिये रंगमंच का सहारा लिया। उनके नाटकों का असर समाज पर बहुत ही गहरे स्तर पर पड़ता था। अपनी कला को चर्मोत्कर्ष पर ले जाकर सामाजिक विडम्बनाओं को बड़े ही सहज और सरल तरीके से अभिव्यक्त करने का हुनर था। भिखारी ठाकुर एक कालजयी रचनाकार थे। भिखारी ठाकुर की रचनाधर्मिता और उनकी कला आज भी रंगकर्मियों के लिए एक चुनौती है। पंडित ब्रजकिशोर त्रिवेदी ने कहा कि भिखारी ठाकुर कबीर की परम्परा के कलाकार थे। उनके अंदर कबीर जैसी आध्यात्मिक दृष्टि थी। विनोद विमल ने कहा कि भिखारी ठाकुर आज पहले से ज्यादे प्रासंगिक हो गए हैं। रमाशंकर तिवारी ने कहा कि भिखारी ठाकुर जैसे कलाकार युगों में पैदा होते हैं। कार्यक्रम की शुरुआत में संगीत प्रशिक्षक विजय प्रकाश पाण्डेय ने भिखारी ठाकुर के विदेशिया नाटक का गीत करिके गवनवा भवनवा में छोड़ी कर, अपने परइल पुरुबवा बलमुआ सुनाया। रंगकर्मी आनन्द कुमार चौहान, ट्विकंल गुप्ता, मुकेश, सोनू ने उनका मशहूर गीत पियवा गईले कलकतव ए सजनी सुनाया। इस मौके पर तारकेश्वर पासवान, सोनू, अजीत, संस्कृति, प्रकृति, अंकिता उपस्थित रहे। संचालन अचिन्त्य त्रिपाठी ने किया।