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विभाजन बाद पाकिस्तान से आए थे आज के कई सफल उद्यमी

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बहराइच। भारत-पाकिस्तान बंटवारे का दंश झेल चुके चार विस्थापित परिवार शहर में भी रहते हैं। एक समय यह सभी विस्थापित थे, लेकिन आज जनपद के सफल उद्यमियों में एक हैं। यह सभी विस्थापित मूल रूप से पाकिस्तान के सिंध और बलूचिस्तान के रहने वाले हैं। इनका कहना है कि विस्थापन की त्रासदी वह अपने पूर्वजों के मुंह से सुनते रहते थे और इस दौरान उनकी आंखों से आंसू आ जाता था। वह एक ऐसा वक्त था, जब कत्लेआम व लाशों से भरी गाड़ियां अटारी पहुंचती थीं। सभी को अपना बसाया हुआ घर, खेत, व्यवसाय सब कुछ छोड़कर खाली हाथ अपने परिवार की जान बचाते हुए रिफ्यूजी स्पेशल ट्रेनों में भरकर अटारी स्थित रिफ्यूजी कैंपों में आना पड़ा था। हालांकि आज 1947 के सभी विस्थापित परिवार के सदस्य अपनी मेहनत व लगन से जिले के सफल उद्यमियों में गिने जाते हैं।
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बंटवारे में पूर्वजों ने बहुत दर्द झेले
विस्थपित होकर जिले में आए स्व.अमरीक लाल मल्होत्रा के पुत्र मनीष मल्होत्रा ने बताया कि कुछ बातें किताबों के जरिये नहीं रूबरू होकर ही बतानी पड़ती हैं। उन्होंने आजादी के समय अपने पूर्वजों का दर्द बयां करते हुए बताया कि आजादी के समय पूर्वजों ने कैसे-कैसे दर्द झेले, इसकी जानकारी वर्तमान व भावी पीढ़ियों को होना जरूरी है। मनीष कहते हैं कि रूह कांप जाती है, जब बचपन में पिताजी द्वारा बंटवारे के वक्त का मंजर सुनाते थे। वो कत्लेआम और लाशों से भरी गाड़ियां अटारी पहुंचती थीं। विस्थापितों को किस तरह अपना बसा बसाया व्यवसाय, खेत, घर सब कुछ छोड़कर खाली हाथ अपने परिवार व बच्चों की जान बचाते हुए रिफ्यूजी स्पेशल ट्रेनों से रिफ्यूजी कैंपों में पहुंचकर रिश्तेदारों को खोजते थे।
बंटवारे का किस्सा सुन आंसू रोके नहीं रुकते
विभाजन के वक्त पाकिस्तान से आए स्व. मुंशीराम अरोरा के पुत्र व व्यापारी नेता कुलभूषण अरोरा ने बताया कि घर के बुजुर्ग जब बंटवारे का किस्सा सुनाते थे, तब आंसू रोके नहीं रुकते थे। एतिहासिक दस्तावेज बन चुके इस बंटवारे ने कई खूनी मंजर देखे। उन्होंने बताया कि जब हिंदुस्तान के बंटवारे की लकीर खींची, तो रातोंरात लाखों लोग अपने ही घर में बेगाने हो गए। धर्म-मजहब के आधार पर लाखों लोगों को न चाहते हुए अपना घर बार छोड़कर भागना पड़ा। इसी अदला-बदली के दौरान कइयों का कत्ल हो गया।
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हमेशा ताजा रहने वाला जख्म विभाजन का दिन
विस्थापित परिवार की दूसरी पीढ़ी के राजेश मंसानी बताते हैं कि विभाजन के रूप में 14 अगस्त 1947 का दिन हमेशा ताजा रहने वाला जख्म है। उन्होंने बताया कि इस दिन जब देश बंटा और भारतीय उपमहाद्वीप के दो टुकड़े होकर एक पाकिस्तान बना। उस वक्त हर तरफ कत्लेआम हो रहा था। भारत को बंगाल से काटकर पूर्वी पाकिस्तान बनाया गया, जो 1971 में बांग्लादेश के रूप में स्वतंत्र राष्ट्र घोषित हुआ था। उस वक्त 1971 में भी हजारों लोग बांग्लादेश से विस्थापित होकर भारत आए थे। राजेश का कहना है कि बंटवारे के जिम्मेदार किसी भी परिस्थिति में माफी लायक नहीं हैं।
बंटवारे का मंजर सुन खौल उठता था खून
विस्थापित परिवार के पंजाबी व्यापारी नेता सुशील भल्ला ने भी दर्द बयां करते हुए बताया कि जब-जब पिताजी स्व.ओमप्रकाश भल्ला बंटवारे की कहानी सुनाते थे, उस वक्त खून खौल उठता था। उन्होंने बताया कि पिताजी बताया करते थे कि जब बंटवारे का बवाल शुरू हुआ, हर तरफ कत्लेआम हो रहा था। उस दौरान पाकिस्तान के साहीवाल में उनके पिता (हमारे दादा जी) को गोली मार दी गई थी। पिताजी अपने परिवार की जान बचाते हुए किसी तरह अटारी पहुंचे थे। बंटवारे का यह मंजर पीढ़ी दर पीढ़ी नहीं भुलाया जा सकता है।
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