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शहीद के परिजनों से किए कई वादे आज भी अधूरे

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हुजूरपुर (बहराइच)। कारगिल शहीद सूबेदार बलकरन सिंह का नाम आज भी स्वर्णाक्षरों में दर्ज है। वर्ष 1999 में हुई कारगिल की लड़ाई में उन्होंने वीरगति पाई थी। जनपद में आज भी बलकरन सिंह का नाम काफी सम्मान से लिया जाता है। उनकी बहादुरी के किस्से आज भी लोगों की जुबान पर हैं। हालांकि, शहीद के परिवार से किए गए सरकार के वादे आज भी अधूरे हैं जिससे क्षेत्र के लोगों में मायूसी है।
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शहीद सूबेदार बलकरन सिंह का जन्म 1951 में ग्राम बसंतपुर में हुआ था। उनके पिता दानबहादुर सिंह भी सेना में थे। उन्होंने 1948 के भारत-पाक युद्ध में शामिल होकर अपना जौहर दिखाया था। पिता से मिली देशप्रेम की प्रेरणा ने बलकरन सिंह को भी सेना में शामिल होने का हौसला दिया। उन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा बसंतपुर व जूनियर हाईस्कूल की परीक्षा हुजूरपुर से की। शिक्षा प्राप्त करने के बाद देशभक्ति की भावना लिए वह दिसंबर, 1971 में 23 राजपूत रेजीमेंट में भर्ती हो गए। वर्ष 1999 में जब पाक सैनिकों व आतंकियों ने भारतीय सीमा में प्रवेश कर कारगिल की पहाड़ियों पर कब्जा जमा लिया तो भारतीय सीमा से पाक आतंकियों और सेना को मुंहतोड़ जवाब देने वाले सैनिकों में बलकरन सिंह भी शामिल थे।
लड़ाई के दौरान पाक सैनिकों को धूल चटाने वाले सूबेदार बलकरन सिंह भी युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। उनकी शहादत से जनपद वासियों को बेहद आघात पहुंचा। आज भी हर वर्ष विजय दिवस के अवसर पर लोग बलकरन को नमन कर उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं। शहादत के बाद सरकार द्वारा उनके परिवार से उनके क्षेत्र में बलकरन सिंह के नाम स्कूल व अस्पताल बनवाने के साथ ही कई वादे किए गए थे, लेकिन ये वादे आज तक पूरे नहीं हो सके।
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