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शान्ति के लिए आत्म रक्षा जरूरी : आचार्य विशुद्ध सागर

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-श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मन्दिर में आयोजित धर्मसभा में बोले
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फोटो संख्या 4
बड़ौत। जैनाचार्य विशुद्धसागर महाराज ने कहा कि ग्रीष्म ऋतु में तीव्र गर्मी से शरीर सुलसता है, शीत में ठण्डी लगती है तो हम गर्मी-ठंडी से बचने का उपाय करते हैं। संसार में निरंतर कोई न कोई दुःख सहना पड़ता है। सांसारिक सुख भोगते समय सुखद लगते हैं, परन्तु वह दुःख ही हैं। संक्लेशता, क्लेश-कलह, ईर्ष्या- परिणाम, संयोग-वियोग कष्टकारी ही होते हैं।
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विशुद्धसागर महाराज शुक्रवार को श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मन्दिर में आयोजित धर्मसभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि दुःखदायी संयोग, इष्ट वियोग में जीव बहुत क्लेश करता है। मैत्री, वात्सल्य, प्रेम में जो आनन्द है, वह क्लेश में किंचित मात्र भी संभव नहीं है। मैत्री आनन्दकारी होती है। जीवन में मैत्री को जीवंत रखना चाहते हो, तो मित्र से अपेक्षा नहीं रखना। अपेक्षाएं मैत्री को नष्ट कर देती हैं। छोटों के साथ रहना सरल है, बड़ों के साथ जीना सरल है, परन्तु बराबर के दो भाई-भाई का एक साथ रहना कठिन है। जहां अपेक्षाएं होती हैं, वहीं कलह होता है। कषाय ही कलह कराती है। कक्षाम ही पाप में प्रवृत्त करती है। कषाय कालकूट जहर है। संबंध भी धर्म के साथ होना चाहिए। पाप प्रियता दुःख का मूल है। पापों से डरो, पापों से भयभीत रहो, पाप प्रवृत्ति में प्रवृत्त मत होओ। इंद्रिय भोगों से दूर रहो। आत्म हित पर विचार करो। माया-मिश्या निधान के क्रीड़ों से बचो, चारित्र रूपी धान्य की रक्षा करो। धन्य-धन्य वह पुरुष जो नर तन पाकर नरोत्तम बनने का पुरुषार्थ कर रहा है। आत्मिक सुख चाहिए तो इच्छाओं को कम करो, आकांक्षाओं से आत्म-रक्षा करो। जागृति जीवन जियो। सुप्त जीवन सुख सुखद नहीं होता। सभा का संचालन पंडित श्रेयांस जैन ने किया। सभा में प्रमोद जैन, अशोक जैन, जितेंद्र जैन, विमल जैन, दिनेश जैन, सतीश जैन, विनोद जैन आदि उपस्थित रहे।
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