- महंगाई से परेशान अभिभावकों की जेब पर बच्चों की पढ़ाई ने बढ़ा दिया बोझ
संवाद न्यूज एजेंसी
बड़ौत। एक तरफ जहां बच्चों के बस्ते का बोझ अभिभावकों की जेब पर पड़ रहा है, वहीं ड्रेस और जूते-मोजे के दामों में भी 15 फीसदी की वृद्धि हुई है। अभिभावकों का आरोप है कि स्कूल संचालकों ने सप्ताह में दो तरह की यूनिफार्म तय कर रखीं हैं। कमीशन के लालच में इसके लिए दुकानें निर्धारित कर दी गईं हैं, जहां से ड्रेस-जूता-मोजा खरीदने का दबाव बनाया जाता है।
एक अप्रैल से नया शैक्षिक सत्र शुरू प्रारंभ हो चुका है। महंगाई से परेशान अभिभावकों की जेब पर इस बार बच्चों की पढ़ाई ने बोझ बढ़ा दिया है। नए सत्र में कॉपी किताबों के साथ स्कूल ड्रेस की कीमतों से अभिभावकों की जेब ढीली हो रही है। ड्रेस की कीमतों में 15 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हुई है। सभी निजी स्कूलों ने अपना-अपना ड्रेस कोड लागू कर रखा है। स्कूल प्रबंधन अभिभावकों को किताबों की सूची देने के साथ ही स्कूल ड्रेस का रंग, जूते-मोजों का डिजाइन भी दे रहे हैं।
जिले में 56 से अधिक निजी स्कूल सीबीएसई बोर्ड से मान्यता प्राप्त है। प्रत्येक स्कूल की अपनी अलग ड्रेस है। कहीं-कहीं किताबों में भी अंतर है। निजी स्कूलों ने जैसे बच्चों की किताबें खरीदने के लिए अपनी दुकानें निर्धारित कर रखी हैं, वैसे ही ड्रेस और जूता-मौजा के लिए। बच्चों की स्कूल ड्रेस यदि बाहर से भी खरीद ली गई तो ‘लोगो’ संबंधित संस्थान से ही खरीदना पड़ेगा। निजी स्कूलों की मनमानी का आलम ये है कि वह अपने हिसाब से वह हर दूसरे-तीसरे साल यूनिफार्म का रंग बदल देते हैं। ये अभिभावकों के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द है।
बोले अभिभावक
स्कूल बच्चों की हर साल ड्रेस को बदल देते हैं। इसमें खेल करते हुए स्कूल सफेद मोजों की धारियों का रंग बदल नया लाने की घोषणा कर देते हैं। इससे अभिभावकों को हर साल ड्रेस और मोजे खरीदने पड़ते हैं। जबकि, हफ्ते में तीन दिन अलग-अलग ड्रेस बच्चे पहनते हैं। - ज्याेति राणा
- स्कूल संचालक कॉपी, पाठ्य सामग्री, ड्रेस सभी कुछ अपनी बताई दुकानों से खरीदवाने का दबाव बना रहे हैं। स्कूल ने साफ तौर पर कहा है कि बच्चे को स्कूल में पढ़ाना है तो सभी सामग्री स्कूल की बताई दुकानों से खरीदनी होगी। -नीशु मलिक।