रटौल। आम की फसल से पहले बागवानों के लिए आड़ू मुनाफे का सौदा साबित हो रहा है। पिछले कुछ सालों में क्षेत्र में आड़ू की खेती की ओर बागवानों का रुझान बढ़ा है। रटौल के अलावा आसपास के क्षेत्र में लगभग 200 एकड़ भूमि पर इसकी खेती की जा रही है।
देश-विदेश में आम की मिठास से अपनी पहचान बनाने वाले रटौल में अब बागवानों का रुझान आम के साथ आड़ू की खेती ओर बढ़ रहा है। किसानों का कहना है कि इसका पौधा दो साल में फल देना शुरु कर देता है।
फसल जल्दी तैयार होने के कारण किसानों को इससे मुनाफा भी अच्छा मिलता है। कम लागत में अच्छी पैदावार होने के कारण बागवान आम और अमरूद के बागानों के साथ आड़ू की पैदावार कर रहे है।
इन किस्म के आड़ू की जा रही पैदावार
रटौल क्षेत्र में लगभग 200 एकड़ में आड़ू के बागान हैं। इनमें आड़ू की प्रभात, शेरे पंजाब, भूरा, बादाम, चालाका और सरबती किस्म का उत्पादन किया जा रहा है। इसकी फसल तैयार हो चुकी है और बाजारों में बागवानों को इसका अच्छा दाम भी मिल रहा है।
सौ से 120 रुपये किलो का मिल रहा भाव
बागवानों का कहना है कि आड़ू की खेती फायदे का सौदा साबित हो रही है। बाजार में सौ से 120 रुपये किलो का भाव मिल रहा है। कस्बे से दिल्ली, गाजियाबाद, नोएडा और हरियाणा आड़ू की सप्लाई की जा रही है।
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कम लागत में अच्छा मुनाफा
कस्बे से दिल्ली, हरियाणा, गाजियाबाद, मेरठ नजदीक होने के कारण आड़ू के अच्छे दाम मिल रहे हैं। आम की फसल से पहले आड़ू से अच्छा खासा मुनाफा मिल रहा है। - आशु अली
- आम बागानों में आड़ू का बागान तैयार कर आम की फसल से पहले कम लागत में अच्छा मुनाफा मिल जाता है। आड़ू का पौधा दो साल में ही फल देने लगता है, जो मुनाफे का सौदा है। - राजू
- आड़ू की फसल से कम लागत में अच्छा मुनाफा मिलने के कारण बागवानों का रुझान आड़ू की ओर बढ़ रहा है। बाजार में रटौल के इसका अच्छा दाम मिल रहा है। - सलीम कुरैशी