-ऋषभदेव सभागार में आयोजित धर्मसभा में बोले विशुद्धसागर महाराज
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बड़ौत। जैनाचार्य विशुद्धसागर महाराज ने कहा कि पवित्र भावों से सच्चे गुरुओं का दर्शन हो जाता है। साथ ही अशुभ कर्मों का क्षय होता है। प्रभु के दर्शन से पाप क्षय होता है। पुण्य चाहिए या पाप, यह निर्णय हमें स्वयं करना है। पुण्यात्मा ही सर्व सुखों का भोक्ता होता है।
विशुद्धसागर महाराज रविवार को ऋषभदेव सभागार में आयोजित धर्मसभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को पद के अनुकूल अपनी वृत्ति करनी चाहिए। उतावलापन व्यक्ति के व्यक्तित्व को धूमिल कर देता है। गंभीरता व्यक्ति के व्यक्तित्व को ऊंचा और प्रभावी बनाती है। जिसका कृतित्व श्रेष्ठ है, उसे पुरुषार्थ पूर्वक अपने व्यक्तित्व को प्रभावी बनाना चाहिए। कहा कि चक्की का चाहे नीचे का पाटा हो, चाहे ऊपर का पाटा हो, दोनों ही पाटे काम के हैं। ऐसे ही चाहे निश्चय हो या व्यवहार हो, दोनों ही आवश्यक हैं। अपनी-अपनी जगह सबका अपना महत्व होता है। सभा का संचालन वाचस्पति पंडित श्रेयांस जैन ने किया। सभा में फूलचंद प्रेमी, अशोक कुमार, अनेकांत जैन, डॉ़ शीतल चंद्र आदि शामिल रहे।