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बड़ौत। आचार्य विशुद्ध सागर महाराज ने कहा कि व्यक्ति को हताश नहीं होना चाहिए। अपने लक्ष्य की ओर साहस करके बढ़ना चाहिए।
जैनमुनि रविवार को ऋषभदेव सभागार में आयोजित धर्मसभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि बाधाएं आएं तब भी डरें न, साहस के साथ आगे बढ़ते रहो। डर कर मार्ग मत छोड़ो, शक्ति पूर्वक अपने लक्ष्य की ओर चलना चाहिए। सही-दिशा की ओर बढ़ाया गया एक पग भी मंजिल प्राप्त करने में सहायक होता है। लक्ष्य बनाओ, पल-पल लग्न पूर्वक लक्ष्य की ओर बढ़ो। उत्कृष्ट-ध्यान के लिए ज्ञान आवश्यक है। ज्ञान प्राप्ति के लिए अभ्यास जरूरी है। आलस छोड़कर काम-वासना से विरक्त, इन्द्रिय-भोगों से परिग्रह रहित, सात्विक जीने वाले साधक को ही शांति-प्रदाता ध्यान शून्य, होता है। ध्यान से आत्मा की सुप्त-शक्तियां जाग्रत होती हैं। ध्यान मुक्ति का साधन है। ध्यान से प्रज्ञा-प्राञ्जल होती है। भवों-भवों में संग्रहीत कर्म के बंधन ध्यान से क्षण भर में क्षय को प्राप्त होते हैं। ध्यान ही श्रमणों की मुख्य-साधना है। ध्यान ही मंगल है, ध्यान ही उत्तम है, ध्यान ही कल्याणकारी है। ध्यान में लीन साधक ही सिद्धि का अधिकारी होता है। ध्यान के लिए एकाग्रता होना चाहिए। साधना साध्य नहीं है, साध्य शांति प्राप्ति है। साधन से साध्य की सिद्धि होती है। सभा का संचालन पंडित श्रेयांस जैन ने किया। सभा में प्रवीण जैन, अतुल जैन, मुकेश जैन, सुनील जैन, सुरेश जैन, मनोज जैन, राकेश जैन उपस्थित रहे।