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रमजान के माह में हर दुआ होती है कबूल

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अग्रवाल मंडी टटीरी (बागपत)। हाफिज मोहम्मद कासिम ने कहा कि हुजुर सल्ललाहु अलैहि और सल्लम का इरशाद है, जब मुसलमान दुआ करता है, वह किसी गुनाह को माफ करने या अन्य कोई दुआ मांगे तो हक तआला शानूहु के यहां से तीन चीजों में से एक चीज जरूर मिलती है या फिर उसे वही मिलती है, जिसकी दुआ की या उसके बदले में कोई बुराई, मुसीबत उस से हटा दी जाती है। आखिर में शबाब उसके हिस्से में लिखा जाता है। उन्होंने कहा कि एक हदीस में आया है, कयामत के दिन हक तआला शानूहु बंदे को बुलाकर इरशाद फरमाएंगे कि ऐ मेरे बंदे मैने तुझे दुआ करने का हुक्म दिया और उसको कबूल करने का वायदा किया । तूने मुझ से दुआ मांगी । इस पर इरशाद होगा कि तूने जो दुआ मांगी, ऐसी कोई नहीं जिसे मैने कबूल न किया हो। हर दुआ याद कराई जाएगी। इसलिए हमें रमजान के महीने में अपनी नमाजे और रोजे का एहतमाम करना चाहिए। इससे हमारी आखिरत बन सके। सबसे पहला सवाल नमाज का होगा। हमें पांचों वक्त समय से नमाज अदा करनी चाहिए।
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