बड़ौत (बागपत)।
जैन संत अरुण मुनि ने कहा किसी को जीवन दे नहीं सकते तो जीवन लेने का अधिकार नहीं है। इस संसार में सब जीना चाहते है कोई मरना नहीं चाहते।
बुधवार को जैन स्थानक शहर में आयोजित धर्मसभा में उन्होंने कहा हिंसा करना सभी पापों की जड़ होती है। हिंसा का पाप करने के बाद मनुष्य सभी प्रकार के पाप करने में हिचकता नहीं। जिंदगी में ऐसा अवसर अवश्य लाओ, जब पापों के प्रति घृणा उत्पन्न हो और दृढ़तापूर्वक पाप से दूर रहने का निश्चय कर लो। इसके विपरीत जिसके मन में अहिंसा की भावना आ जाती है, वह व्यक्ति धर्म के नजदीक आ जाता है। उन्होंने कहा यदि मन पापी है तो वह हिंसा और पाप करने में लीन है, वह धर्म को नहीं अपना सकता और जो अहिंसा को अपना लेता है, वह पाप नहीं कर सकता। किसी के पापों का हरण कर लेना ही प्राण पति पात है। मन वचन काया से दूसरों को जो पीढ़ा दी जाती है। उसे हिंसा कहा जाता है। उन्होंने कहा मनुष्य को सबसे अधिक जिन चीजों की इच्छा होती है। उनमें धन-वैभव, सत्ता और सौंदर्य हैं। इन सबका हरण हो जाए तो मन को केवल दुख होता है। जब जीवन ही चला जाए तो फिर क्या दशा होगी। ऐसा कोई जीवन नहीं होता जिसके बिना हम जी नहीं सकते। इससे पूर्व अमन मुनि ने भी धर्मसभा में विचार रखे। इसमें डीके जैन, भोपाल जैन, भारत भूषण, हरीश चंद्र, जयपाल, राजीव, हंस कुमार जैन, नीरज, दीपक, शैलबाला, इंद्राणी, कालू जैन, रेखा, उर्मिला, अनुराधा, मोनिका आदि रहे।