बड़ौत (बागपत)।
आचार्य सुंदर सागर महाराज ने कहा कि जैन धर्म किसी संस्था व संप्रदाय का नहीं है। जो अपनी आत्मा को समझाना चाहता है, उसके लिए जैन धर्म है।
वे सोमवार को विहर्ष सभागार मेें धर्मसभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि सती सीता को दुर्भाग्य में वन मेें छोड़ा गया, वह चाहती तो वह अपने पिता जनक के पास जा सकती थी, लेकिन किसी को नहीं पुकारा और अपना पुरूषार्थ किया। लवकुश को योग संस्कार दिए। प्रत्येक आत्म में भगवान की शक्ति है। इस सत्य को सहन कर परिस्थितियों में हार नहीं मानी। निरंतर कर्तव्य का पुरूषार्थ करती है। दुर्भाग्य के होने पर हम पुरूषार्थ करते रहे, तो वह दुर्भाग्य भी सौभाग्य के रूप में परिणत बन जाता है। उन्होंने कहा कि सीता के समर्पण की जीत हुई। लवकुश को देखकर राम अति प्रसन्न हुए, सीता से महलों में लौटने का आह्वान किया, लेकिन अब सीता ने मोक्ष पुरूषार्थ की ओर कदम बढ़ा दिए। इसलिए अपने पुरूषार्थ के बल पर हम भाग्य को बदल सकते हैं। जैसा पुरुषार्थ होगा, वैसा ही भाग्य बनेगा। इससे पूर्व आर्यिका सुनयमति ने विचार रखे। शाम को गुरु भक्त का आयोजन किया गया। सभा में मदनलाल, प्रमोद, अशोक, वरदान, मांगेलाल, शशि, इंद्राणी, सुनीता शामिल रहे।