बड़ौत (बागपत)। अरुण मुनि ने कहा कि श्रवण संस्कृति का आधार मन का निग्रह करना है। उस पर नियंत्रण रखना सबसे आवश्यक है।
वे बुधवार को जैन स्थानक नई मंडी में धर्मसभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि मनुष्य के अपने विचार अपने कर्म ही सुख और दु:ख प्रदान करते हैं। ये कहीं बाहर से नहीं आते। कोई देवता भी किसी को सुख या दुख नहीं देता। उसके अपने कर्मों का फल होता है। अच्छे कर्म सुख देते हैं और बुरे कर्म दुख। उन्होंने यह भी बताया कि बिना मन को शांति किए धर्म भी नहीं किया जा सकता। सारा खेल मन का होता है। मन स्थिर होगा तो धर्म भी किया जा सकता है। स्थिर मन कहीं नहीं टिकता। उन्होंने कहा कि इस बात का चिंतन करों कि मुझे बुढ़ापा आ रहा है। मौन, ध्यान, जप, तप आज ही कर लो। बुढ़ापा आने पर फिर कुछ नहीं होता। तरह-तरह की बीमारियां हो जाती है। उन्होंने चार माह तक चलने वाले चातुर्मास को एक संध्या बताते हुए कहा कि संस्कारों की सुरक्षा करने से मनुष्य शिखर पर पहुंच सकता है। सारें दुखों का कारण है शरीर से मोह और सुख पाने के लिए मोह का त्याग करना पड़ेगा। इससे पूर्व अभिनव मुनि ने धर्मसभा में विचार रखे। धर्मसभा में जयप्रकाश, ओमप्रकाश, अनिल, हंस कुमार जैन, शैलबाला, इंद्राणी, कमलेश, उर्मिला, मोनिका आदि उपस्थित रहे।