बड़ौत (बागपत)।
जैन संत अरुण मुनि ने कहा कि शांति मन से किए गए पुरूषार्थ का मन जल्दी मिलता है। मलिन मन से किया गया पुरूषार्थ उत्तम फलदायी नहीं होता।
वे सोमवार को जैन स्थानकवासी शहर धर्म सभा मेें बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि जप, तप, ध्यान करने के साथ साथ मनुष्य धैर्य भी धारण करे तो उसे उत्तम फल मिलता है। आदमी सब कुछ करने को तैयार है, लेकिन धैर्य के प्रभाव मेें कुछ नहीं कर पाता। उन्होंने कहा कि हमेशा अपने अंदर धैर्य को देखना है, कहीं मीटिंग में जाना है, पैदल जाने में समय अधिक लगेगा और रिक्शा वाला जाने को तैयार नहीं तो मन अशांत हो जाता है। इसमें धैर्य नहीं खोना चाहिए। कई प्रकार के उतराव-चढ़ाव आते हैं। इससे घबराना नहीं चाहिए। उन्होंने कहा कि जैन धर्म का जो कर्मवाद है, वह ऐसा ही है। इससे पूर्व अमन मुनि ने भी विचार रखे। धर्मसभा में कामता प्रसाद, प्रवीण जैन, नवीन जैन, नीरज जैन, हंसकुमार जैन, कालू जैन, अतुल जैन, शैलबाला, कुसुम, भावना, छवि, कमलेश, अंजलि, शालिनी शामिल रहे।