ग्रामीणों के मुताबिक, 354 वर्ष से पहले की बात है डोरवा चौहान बस्ती में एक परिवार रहता था। जिनका नाम टोकरी था। टोकरी के तीन पुत्र हुए गुज्जन, बाल गोविंद और धर्मू। गुंजन और बाल गोविंद की महामारी में मृत्यु हो गई। धर्मू को कोई संतान नहीं थी। तब उनके पिता टोकरी वंश को लकर चिंतित रहने लगे। एक दिन एक फकीर उनके पास आए और उनकी चिंता का कारण पूछा। टोकरी के बताने पर उस फकीर ने उन्हें अंजान शहीद में मनाई जाने वाली ताजिया के विषय में बताया और कहा कि वहां जाकर प्रार्थना करें। तब आपका वंश आगे चलेगा।
इस पर टोकरी अपने पुत्र धर्मू और बहू सत्यवती को मुहर्रम के समय लेकर अंजान शहीद गए और वहां प्रार्थना की। एक साल के अंदर ही उनकी मनोकामना पूर्ण हुई। धर्मू को चार पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। धीरे-धीरे इनका वंश बढ़ता गया। आज 125 से अधिक घरों की चौहान बस्ती है। आज भी इस बस्ती के लोग इस परंपरा को निभा रहे हैं।