आजमगढ़। सन 1530 में शेरशाह सूरी की ओर से बनवाए गए शाही पुल की उम्र 494 साल हो चुकी है। फिर भी यह आज भी तन कर खड़ा है। अफसरों और नेताओं की अनदेखी के कारण यह जर्जर हो गया है। एक शहंशाह ने इसे बनवाया तो लगभग पांच शताब्दियों तक लोगों ने अपनी गाड़ियों को इसके सीने पर दौड़ाया। वर्तमान में नया पुल बनने के बाद अब लोग इस पर कूड़ा फेंक रहे हैं। वहीं इसकी दीवारों पर उगे बड़े-बड़े पेड़ इसकी दीवारों को खोखला कर रहे हैं।
हरबंशपुर में बना शाही पुल कभी भी अस्तित्व खो सकता है। वैसे तो इस पर बड़े वाहनों का चलना प्रतिबंधित है लेकिन इसके संरक्षण के नाम पर कुछ नहीं किया गया है। अगर जिम्मेदार नहीं चेते तो यह एतिहासिक पुल इतिहास बनकर रह जाएगा। सन् 1528 में शेरशाह सूरी नौकरी के लिए जौनपुर के गवर्नर जुनैद के पास पहुंचा और बाबर की सेना में भर्ती हो गया था। उसने अफगानों के विरुद्ध बाबर का साथ दिया। इससे प्रसन्न होकर बाबर ने 1528 में सासाराम की जागीर पर कब्जा कर उसे शेर खां को दे दिया। बाबर की सेना में रहते हुए शेर खां का अक्सर आजमगढ़ के रास्ते आना-जाना होता था। आवागमन की दिक्कत को देखते हुए सन् 1530 के आस-पास शेरशाह सूरी ने आजमगढ़ शहर में तमसा नदी पर शाही पुल का निर्माण कराया था। यह पुल आज भी जिले में आजादी के बाद बने पुलों से बेहतर स्थिति में दिखता है, क्योंकि तमसा नदी पर ही नरौली में लगभग चार दशक पूर्व बने पुल की अब तक तीन बार मरम्मत हो चुकी है। इस पुल की मरम्मत के बारे में कभी किसी ने सोचा भी नहीं और यह अपनी जगह पर अडिग रहकर लोगों को सेवा देता रहा। अब नए पुल के निर्माण के बाद यह पुल निष्प्रयोज्य हो गया है। जिसके कारण लोग अब इस पर कूड़े को फेंकते हैं। जबकि इस एतिहासिक पुल को संरक्षित किया जाना चाहिए।
00
पुल के बगल में नए पुल का निर्माण हो गया है। जिसके कारण यह पुल निष्प्रयोज्य हो गया है। इसके संरक्षण के लिए शासन से कोई बजट नहीं आता है। अगर बजट आता है तो इसे संरक्षित करने का कार्य किया जाएगा।
संकर्षण लाल, अधिशासी अभियंता पीडब्ल्यूडी निर्माण खंड दो।