आजमगढ़। स्वतंत्रता आंदोलन में देश के कई रणबांकुरों ने कुर्बानी दी है। इन्हीं में से स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व. रामहर्ष सिंह भी थे। उन्होंने अंग्रेजों को खुली चुनौती देते हुए तरवां थाने में आग लगा दी थी। उन्हें नाइजीरिया में भी सम्मानित किया गया था।
लालगंज तहसील क्षेत्र के ओघनी गांव में 28 फरवरी 1912 को जन्मे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रामहर्ष सिंह सुभाष चंद्र बोस के नारे से प्रभावित होकर आजादी की लड़ाई में कूद पड़े थे। उन्होंने क्रांतिकारी साथियों के साथ मिलकर 18 अगस्त 1942 को तरवां थाने को फूंक दिया था। इस मामले में उनके खिलाफ मुख्य अभियुक्त के तौर पर मुकदमा दर्ज हुआ था। इस घटना में तेजबहादुर सिंह, रामहर्ष सिंह सहित सैकड़ों लोग शामिल थे। तरवां थाने में आग लगाने के साथ ही वहां रखा असलहा व रजिस्टर लूट लिया था। इस घटना के बाद पूरे क्षेत्र में घोड़े पर सवार होकर बच्चेलाल शास्त्री व रामहर्ष सिंह ने जनता को आजादी का संदेश दिया। इस घटना के बाद काफी दिनों तक तरवां थाने का चार्ज लेने कोई अंग्रेज अफसर नहीं पहुंचा।
04 फरवरी 1943 को फूलपुर रेलवे स्टेशन को क्रांतिकारियों ने फूंककर वहां तिरंगा फहरा दिया। इस घटना के बाद रामहर्ष सिंह को अंग्रेज गिरफ्तार करने में कामयाब हुए और उन्हें नैनी जेल में बंद कर दिया। वर्ष 1947 में देश आजाद होने के बाद लालबहादुर शास्त्री के प्रयास से इलाहाबाद के नैनी सेंट्रल जेल से उनकी रिहाई हुई। उनके सुपुत्र शांतिभूषण सिंह वर्तमान में नाइजीरिया में इंजीनियर पद पर कार्यरत हैं और परिवार सहित वहीं रहते हैं।
उनके विशेष आग्रह पर दो दशक पूर्व रामहर्ष सिंह अपनी पत्नी देवमती देवी के साथ नाइजीरिया गए थे। भारत की आजादी में उनके योगदान की जानकारी पाकर लागोस स्टेट आॅफ चीफ इन नाइजीरिया ने स्वतंत्रता सेनानी को रात्रि भोज पर आमंत्रित किया था। उनके आग्रह को स्वीकार करते हुए वह सपरिवार कार्यक्रम में शामिल हुए थे। वहां उन्हें सम्मानित किया गया था। इसके अलावा दो बार उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 27 जुलाई 2014 को 104 साल की उम्र में उनका निधन हो गया।