अमिलो। राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर कई कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। जिसमें बुनकरी को बढ़ावा देने की बात कही गई। लेकिन इन हथकरघों को चलाने वाले बुनकरों का मोह धीरे-धीरे बुनकरी के पेशे से हट रहा है और हथकरघा चलाने वाले हाथ अब विदेशों में काम तलाश करने निकल रहे हैं। मुबारकपुर नगर और आस पास के गांवों में लगभग 25 साल पहले बुनकर दूसरों को रोजगार देने के लिए बुनाई कला का हुनर सिखाकर काम पर लगा देता था। लेकिन आज बुनाई की बदौलत खुद उनका रोजगार नहीं चल पाता है। बुनाई से आमदनी कम और मंहगाई अधिक होने से बुनकरो को दो जून की रोटी के लाले पड़े हुए हैं। ऐसे में घर परिवार का भरण-पोषण करने मे दिक्कत आड़े आ रही है। आगे बच्चों को उज्जवल भविष्य के लिए पढ़ाना लिखाना सपने के समान हो चुका है। जिसका परिणाम है कि बहुत से बुनकर अब विदेश की राह पकड़ चुके हैं और बहुत से पकड़ने की तैयारी में जुटे हैं। ऐसा नहीं है कि सरकार की ओर से इसे उबारने के लिए कुछ नहीं किया जाता। सरकार की ओर से बुनकरों के लिए अनेक योजनाओं का संचालन किया जाता है लेकिन महंगाई के कारण खर्चा अधिक और आमदनी कम होने के कारण बुनकर इससे दूर होते जा रहे हैं।
बोले बुनकर
जिले के बताउर्रहमान ने बताया कि आज हथकरघा पर रेशमी साड़ी की बुनाई की मजदूरी दिन रात एक कर मात्र दो सौ रुपए का काम करना। मंहगाई के इस दौर में आटा, दाल, चावल का खर्च चलाना कठिन है। बच्चो के दवा इलाज पर ही सारा खर्च हो जाता है। वहीं आमिर ने कहा कि बुनाई से खर्च नहीं चल सकता है। इसलिए बाहर विदेश रोजी रोटी के लिए जाना मजबूरी है। एक दिन हम दूसरो को रोजगार उपलब्ध कराते थे। आज ठीक इसके उलट हमेें रोजगार के लिए पलायन करना पड़ता है। इसी मसले पर खुर्शीद आलम ने बताया कि बुनकरी के धंधे में पहले की अपेक्षा अब काफी बदलाव आया है। बुनकर आज कठिन दौर मे जी रहा है। गरीबी रेखा का नीचे समय गुजारने को विवश है। उसे न चाहते हुए अपने इस पेशे से मुंह मोड़ना पड़ रहा है। वहीं, हाजी मुश्ताक अहमद ने कहा कि सरकर की योजनाओं का हाल यह कि रसूखदार लोग ही इसका फायदा उठा कर मस्त है। जो बुनकर हैं जरूरतमंद हैं उन तक इन योजनाओं का लाभ नहीं पहुंच रहा है। जिसके कारण वह बदहाली में जीवन बिता रहा है।