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बालिका की हत्या, शालू का अपहरण बना है रहस्य

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आजमगढ़। अतरौलिया थाना क्षेत्र की रहने वाली एक आठ वर्षीय बालिका की जघन्यता पूर्वक हुई हत्या और अहरौला थाना क्षेत्र की रहने वाली एक किशोरी का रहस्यमय ढंग से हुई मौत और चार वर्ष बाद उसके जिंदा होने का मामला आज भी रहस्य बना हुआ है। किशोरी शालू का मामला अभी भी कोर्ट में विचाराधीन है। जबकि बालिका के हत्या की गुत्थी सुलझाने के लिए लिए गए डीएनए टेस्ट के नमूने की रिपोर्ट ही अभी तक नहीं आ सकी है।

घटनाओं पर गौर करें तो अतरौलिया थाना क्षेत्र की रहने वाली आठ वर्षीय बालिका 20 दिसंबर 2015 को अपने बाबा के साथ घर से करीब सौ मीटर दूर बाजार गई थी। टाफी लेकर घर लौटते समय रास्ते से ही वह गायब हो गई। 21 दिसंबर को थाने में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई गई। लोग अभी उसे तलाश ही रहे थे कि 31 दिसंबर की शाम को बालिका की लाश उसके घर के पीछे गड्ढा खोदकर दफनाई हुई मिली।
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पीएम रिपोर्ट से पता चला कि बालिका के प्राइवेट पार्ट में छह से अधिक चोटें लगी थी। बालिका को इंसाफ और आरोपियों को सजा दिलाने के लिए तमाम तरह के आंदोलन हुए। पिता, चाचा, भाई सहित गांव के 17 लोगों का डीएनए टेस्ट के लिए नमूना लिया गया, लेकिन अब तक ना तो रिपोर्ट आई और ना ही घटना का खुलासा हुआ।

इससे भी बड़ा रहस्यमय कांड अहरौला थाना क्षेत्र के मतलूबपुर गांव निवासी किशोरी सावित्री उर्फ शालू शर्मा का रहा। 26 मई 2012 को शालू रहस्यमय ढंग से गायब हो गई। दो दिन बाद 28 मई को जौनपुर जिले के सरायख्वाजा थाना क्षेत्र में हत्याकर फेंकी हुई युवती की लाश मिली थी। परिवार के लोग कपड़ों के आधार पर शालू शर्मा की पहचान किए। साथ ही आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए नाई समाज सहित तमाम संगठनों के लोग एक साल तक दुकानें बंद कर धरना प्रदर्शन करते रहे।
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बाद में मामला ठंडा पड़ गया। चार वर्ष बाद दिसंबर 2016 को अचानक शालू शर्मा जिंदा हो गई और दीवानी न्यायालय में आकर अपना बयान दर्ज कराते हुए बताया कि मैं जिंदा हूं। शालू ने अपनी दुर्दशा के लिए घर वालों को जिम्मेदार ठहराया। शालू के निवेदन पर कोर्ट ने उसे घर भेजने की बजाय लुधियाना की समाजसेवी संस्था के हवाले कर दिया, लेकिन रहस्य अभी भी बरकरार है।
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