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कई वजहों से गिर रही थी पुलिस की साख

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आजमगढ़। शासन की तरफ से जारी ट्रांसफर लिस्ट में एसपी रविशंकर छवि के स्थानांतरण की सूचना मिलते ही जिले में चर्चाओं का बाजार गरमा गया। कई वजहों से बेहतर काम करने के बावजूद पुलिस की साख गिर रही थी। इससे विभाग और सरकार दोनों की किरकिरी हो रही थी। यदि थोड़े ही बेहतर ढंग से इन घटनाओं को समय रहते सुलझा लिया जाता तो शायद इस प्रकार का धब्बा नहीं लगता। राजनीति दवाब के चलते पुलिस की साख गिरती जा रही थी। वर्ष 2013-14 में बदमाश पुलिस पर हावी थे। जिसका साफ उदाहरण सीओ सिटी के गनर को गोली मारने की घटना से लगाया जा सकता है। सत्ता परिवर्तन के साथ ही कानून व्यवस्था में सुधार पर जोर दिया गया। जिसका परिणाम रहा कि वर्ष 2017 में पुलिस ने ताबड़तोड़ एनकाउंटर कर कइयों को ढेर कर दिया, जबकि कई गोली से घायल हो गए। पुलिस के कामों में भी दिन-ब-दिन सुधार दिखने लगा था। इसी बीच 12 नवंबर को अहरौला थाने की पुलिस ने निर्दोष मो. मकसूद का पशु तस्करी में चालान कर दिया। हालांकि सघन जांच पड़ताल के बाद 13 दिन बाद मकसूद जेल से रिहा हो गया। यह क्रम चल ही रहा था कि रानी की सराय थाना क्षेत्र में फर्जी गैंगरेप की घटना को तूल देते हुए राजनीतिक रूप दे दिया गया। पुलिस की लापरवाही के चलते यह मामला तिल का ताड़ बनता गया। इससे सरकार की भी खूब किरकिरी हुई। इसके अलावा तमाम कोशिशों के बावजूद जेल के भीतर अपराधियों के मोबाइल चलाने पर रोक लगाने में भी पुलिस नाकाम रही। जबकि जेल के भीतर से अपराधी देवगांव और अहरौला बाजार में हत्या की दो घटनाओं को अंजाम दे दिया गया। सूत्रों के मुताबिक रानी की सराय की घटना के खुलासे के बाद हंगामा करने वालों पर सख्त कार्रवाई कर दी गई होती तो शायद पुलिस की साख बच सकती थी। इस हड़ताल में सभी राष्ट्रीयकृत बैंकों के साथ ही प्राइवेट, ग्रामीण व कोऑपरेटिव बैंक कर्मचारी भी शामिल रह
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