आजमगढ़। नगर कोतवाली क्षेत्र के बद्दोपुर गांव निवासी रमेश सिंह पुत्र रामानंद सिंह ने एक साथ दो पदों पर नियुक्ति लेते हुए वेतन आहरित किया। शिकायत होने पर एक नौकरी जो संविदा कर्मी की थी तो उसे छोड़ दिया। लेकिन समाज कल्याण द्वारा संचालित विद्यालय में शिक्षक के पद पर आज भी कार्यरत हैं। इसकी शिकायत होने पर समाज कल्याण विभाग की ओर से इसकी जांच कराई गई। जिसमें रमेश सिंह पर लगे आरोप सत्य मिले। न्यायालय के आदेश पर एफआईआर भी दर्ज हुआ लेकिन पुलिस ने एफआर लगा दिया। शिकायत कर्ता दोबारा न्यायालय पहुंचा तो न्यायालय ने एफआर को निरस्त करते हुए दोबारा विवेचना का आदेश दिया है।
रमेश सिंह 25 अक्टूबर 2003 से 24 नवंबर 2005 तक उप्र राज्य सड़क परिवहन निगम के डा. अंबेडकर डिपो में बतौर संविदा चालक के पद पर कार्य करते हुए वेतन आहरित किए। उसी समय वह समाज कल्याण विभाग की ओर से संचालित हरिजन बाल विद्या मंदिर सैदपुर में सहायक अध्यापक के पद पर कार्यरत रहते हुए वेतन आहरण किया। इसकी शिकायत भारतीय मानवाधिकार एसोसिएशन के सदस्य अरुण कुमार सिंह ने मार्च 2015 में जिलाधिकारी से की। उनकी इस शिकायत पर जिलाधिकारी ने समाज कल्याण अधिकारी को इस मामले की जांच का निर्देेश दिया। जांच के बाद समाज कल्याण अधिकारी ने जिलाधिकारी को सौंपी जांच आख्या में इस बात की पुष्टि की कि रमेश सिंह शिक्षक रहते हुए संविदा चालक का वेतन भी आहरित करते रहे हैं। इस पर समाज कल्याण अधिकारी ने इनका वेतन रोक दिया। वेतन रोकने के बाद रमेश सिंह के खिलाफ जिला प्रशासन की ओर से कोई कार्रवाई नहीं की गई। तब शिकायतकर्ता ने न्यायालय की शरण ली। न्यायालय के आदेश पर नगर कोतवाली में 14 दिसंबर 2015 को रमेश सिंह के खिलाफ धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज किया। लेकिन विवेचना के दौरान विवेचक ने फाइलन रिपोर्ट लगा दी। इसकी जानकारी होने पर शिकायतकर्ता दोबारा न्यायालय की शरण में पहुंचा। न्यायालय ने पुलिस की एफआर को निरस्त करते हुए दोबारा विवेचना करने का आदेश दिया है।
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इतना ही नहीं रमेश सिंह की नियुक्ति 1984 में दर्शाई गई है। जबकि उस समय उनकी उम्र लगभग 13 वर्ष थी और 1985 में उन्होंने हाईस्कूल की परीक्षा दी। जिसमें वह अनुत्तीर्ण हुए। यह अभिलेख भी पुलिस के विवेचक के पास थे लेकिन उसने इसे भी दरकिनार कर दिया।
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रमेश सिंह ने जिस ड्राइविंग लाइसेंस के सहारे संविदा चालक की नौकरी हासिल की। वह गाजीपुर जनपद से बना हुआ था। जिसके सहारे वह बस को चलाने का कार्य करते थे। लेकिन जब इसकी जांच कराई गई तो वह भी कूटरचित पाया गया। यह रिपोर्ट भी विवेचक के पास थी लेकिन उसने उसे भी दरकिनार करते हुए एफआर लगा दी।
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यह हमसे पहले का मामला है मुझे इसकी जानकारी नहीं है। फाइल को देखने के बाद ही कुछ बताया जा सकता है। अगर कोर्ट का दोबारा विवेचना करने का आदेश है तो विवेचना होगी।
सच्चिदानंद, सीओ सिटी।